भारतीय पत्रकारिता के 250 वर्षों की कहानी कहती पुस्तक का लोकार्पण

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि विभाग द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक विजयदत्त श्रीधर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ के लोकार्पण एवं पुस्तक-परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता की आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय और विशिष्ट अतिथि थे वरिष्ठ संपादक व पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र।

पुस्तक को लोकार्पण करते मंचासीन विद्वतजन
Written By : रामनाथ राजेश | Updated on: February 13, 2026 11:02 pm

इस अवसर पर समग्र भारतीय पत्रकारिता पुस्तक के लेखक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय, काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ला ने वक्ता के रूप में अपने विचार किए। आईजीएनसीए के कलानिधि विभागाध्यक्ष एवं डीन प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि आज का दिन अनोखा है, क्योंकि ये पुस्तक कई मायनों में अनूठी है। कार्यक्रम का प्रास्ताविक वक्तव्य एवं संचालन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के जनसंचार विभाग के प्राध्यापक प्रो. कृपाशंकर चौबे ने किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल पर आधारित 15 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म से हुआ। प्रभात खबर के प्रधान संपादक अंकित शुक्ला ने राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का लिखित वक्तव्य पढ़कर सुनाया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीय पत्रकारिता और पश्चिमी पत्रकारिता में भिन्नता है। भारत ने अपनी पत्रकारिता पश्चिमी पत्रकारिता से अलग राह बनाकर शुरू की। उनके अनुसार, भारत में पत्रकारिता की नींव निजी उद्यम से ही पड़ी। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ के तीनों खंडों के हर पन्ने पर नायाब सूचनाएं हैं।

अध्यक्षीय सम्बोधन में रामबहादुर राय ने कहा, इस पुस्तक का दूसरा खंड ज़रूर पढ़ना चाहिए। इसमें 1881-1920 के बीच 40 वर्षों की भारतीय पत्रकारिता का लेखा-जोखा है। इस खंड में तिलक युग समाप्त हो रहा है और गांधी युग शुरू हो रहा है। अगर हम गांधी युग की पत्रकारिता को समझ लें, तो पत्रकारिता में जो गिरावट है, बल्कि हर क्षेत्र में जो गिरावट हुई है, उसको समझ सकते हैं। उन्होंने श्री अरबिंदो को उद्धृत करते हुए कहा, पत्रकारिता अपने समय की सबसे बड़ी चुनौती की पहचान करती है। उस चुनौती के बाद, समस्या के निराकरण का उपाय खोजना और उसमें अपनी पूरी ताकत लगा देना ही पत्रकारिता है। उन्होंने कहा कि ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ से एक दिशा हम लोगों को मिलती है।

अच्युतानंद मिश्र ने कहा, रामबहादुर राय द्वारा लिखा गया पुरोकथन पढ़ लें, तो पता लग जाएगा कि इस पुस्तक में क्या है और पुस्तक का उद्देश्य क्या है। श्रीधर जी का मूल प्रयत्न पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास को लोगों के सम्मुख रखना है। उन्होंने यह भी उदाहरण दिया कि देश में पत्रकारिता को किन-किन रूपों में देखा गया है।

लेखकीय वक्तव्य में विजयदत्त श्रीधर ने कहा, यह कृति किसी एक व्यक्ति के लेखन का परिणाम नहीं, बल्कि पत्रकारिता, नवजागरण और बौद्धिक परंपरा की दीर्घ सामूहिक साधना का प्रतिफल है। उन्होंने उल्लेख किया कि माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल 19 जून 1984 को सीमित संसाधनों और 73 पत्र-पत्रिकाओं से आरंभ हुआ। बयालीस वर्षों के बाद, आज ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय में पाँच करोड़ पृष्ठों की संपदा है। इसमें अंग्रेजी सहित सभी भारतीय भाषाओं की सामग्री है, जिसमें पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य, समाज, संस्कृति और दुर्लभ प्रकाशनों का समृद्ध संसार सुरक्षित है।

उन्होंने माधवराव सप्रे की परम्परा को इस कार्य की वैचारिक आधारशिला बताते हुए कहा कि हिंदी कथा, समालोचना, शब्दावली-निर्माण और प्रतिभा-परख की उनकी दृष्टि ने न केवल एक युग को दिशा दी, बल्कि बाद की पीढ़ियों के लिए भी बौद्धिक मानक स्थापित किए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इतिहास कभी पूर्ण नहीं होता; नए तथ्यों के आलोक में उसका निरंतर संशोधन आवश्यक है और तीन खंडों का प्रस्तुत ग्रंथ इसी जीवंत इतिहास-बोध का परिष्कृत रूप है।

विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि पत्रकारिता का इतिहास केवल स्वतंत्रता-संग्राम तक सीमित नहीं, बल्कि नवजागरण, समाज-सुधार, भाषा-विकास और सार्वजनिक जीवन की व्यापक प्रक्रिया का प्रतिबिंब है। कठिन समयों में, विशेषकर आपातकाल जैसे दौर में पत्रकारिता द्वारा प्रतीक, मौन और साहस के माध्यम से दर्ज किया गया प्रतिरोध उसकी नैतिक शक्ति को प्रमाणित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि भाषाएं संवाद और शब्दों की निरंतर आवाजाही से जीवित रहती हैं और हिंदी गद्य के निर्माण में प्रारम्भिक समाचार-पत्रों व संपादकों की भूमिका निर्णायक रही है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पत्रकारिता सूचना मात्र नहीं, बल्कि विवेक, दायित्व और सार्वजनिक चेतना का क्षेत्र है, और किसी भी व्यक्ति या परम्परा का मूल्य पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके बड़प्पन और नैतिक साहस से तय होता है।

व्योमेश शुक्ला ने कहा, अभाग्यवश साहित्य अब एक अलग विधा हो गई है और पत्रकारिता अलग विधा। 100 वर्ष पहले साहित्य और पत्रकारिता अलग नहीं थे। यह विभाजन कुछ दशक पहले हुआ है। ध्यातव्य है कि भारत में पत्रकारिता ने 246 साल की ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर ली है। यह यात्रा नवजागरण आंदोलन के साथ-साथ चली है। इस यात्रा में राष्ट्रीयता के अनेक महत्वहपूर्ण पड़ाव हैं।

ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय (माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल) के तत्वावधान में अध्येता विजयदत्त श्रीधर ने भारतीय पत्रकारिता के तमाम बूझे-अबूझे पहलुओं की महागाथा का दस्तावेज़ीकरण ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ में किया है। ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ ग्रंथ के तीन भाग हैं- पहली सदी : 1780-1880, तिलक युग : 1881-1920 और गांधी युग : 1921-1948, साथ ही, तीसरे भाग में आजादी के बाद प्रकाशित प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं का परिशिष्ट जोड़ा गया है। यह कृति भारतीय पत्रकारिता के वैचारिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रनिर्माण में उसके योगदान का व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करती है।

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