ओवैसी के इस ऐलान के साथ ही राज्य में अब तक एकतरफा माने जा रहे अल्पसंख्यक वोट बैंक पर सीधी राजनीतिक जंग छिड़ती नजर आ रही है, जो अब तक ममता बनर्जी (Mamata Banerjee ) और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ( Trinamool Congress ) का मजबूत आधार रहा है।
हैदराबाद में आयोजित कार्यक्रम में ओवैसी ने बिना नाम लिए ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “राज्य में मुस्लिमों की आबादी करीब 30 फीसदी है, लेकिन उनसे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोट तो लिए जाते हैं, उन्हें उनका हक और राजनीतिक भागीदारी नहीं दी जाती।” उन्होंने लोगों से अपील की कि वे “मजलिस को मजबूत करने के लिए दुआ करें।”
ओवैसी के इस बयान और गठबंधन के ऐलान ने तृणमूल कांग्रेस के लिए नई चिंता खड़ी कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मजलिस और जेयूपी का गठजोड़ सीमित क्षेत्रों में भी प्रभावी रहा, तो मुस्लिम बहुल जिलों—जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर—में वोटों का बंटवारा तय माना जा सकता है। इसका सीधा असर 20 से 30 सीटों तक पड़ सकता है, जहां मुकाबला अक्सर बेहद करीबी रहता है।
इधर, Bharatiya Janata Party (भारतीय जनता पार्टी) इस पूरे घटनाक्रम को अपने लिए राहत के रूप में देख रही है। पार्टी सूत्रों का मानना है कि विपक्षी वोटों में किसी भी तरह का विभाजन उसके लिए अवसर पैदा करता है। ऐसे में जहां पहले मुकाबला सीधे तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा था, अब वहां त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।
हालांकि, यह भी सच है कि बंगाल में मजलिस की संगठनात्मक पकड़ अभी सीमित है और उसकी चुनावी सफलता काफी हद तक स्थानीय नेतृत्व और सीटों के चयन पर निर्भर करेगी। लेकिन ओवैसी का यह दांव ममता बनर्जी के उस सामाजिक समीकरण को चुनौती देता है, जिसके सहारे वह लगातार चुनावी सफलता हासिल करती रही हैं।
तृणमूल कांग्रेस पहले ही राज्य की 291 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटी है और खुद को एक बार फिर सत्ता में वापसी के लिए आश्वस्त दिखा रही है। लेकिन ओवैसी के इस कदम ने यह साफ कर दिया है कि इस बार का चुनाव पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा जटिल और बहुकोणीय होने जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ओवैसी का यह हस्तक्षेप महज प्रतीकात्मक साबित होगा या फिर वह वाकई ममता बनर्जी के सबसे मजबूत वोट बैंक में ऐसी सेंध लगा पाएंगे, जो चुनावी नतीजों की दिशा बदल दे।
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