कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची के निदेशक श्री कर्मा जिम्पा भूटिया (आईएफएस) उपस्थित रहे। अपने संबोधन में उन्होंने झारखंड की जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में पारम्परिक कला रूपों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चित्रकला के माध्यम से यह कार्यशाला समाज में सांस्कृतिक चेतना एवं ऐतिहासिक समझ को गहराई से प्रभावित करेगी। उन्होंने कहा कि कार्यशाला में निर्मित कलाकृतियां भगवान बिरसा मुंडा के जीवन, संघर्ष एवं समाज पर उनके प्रभाव को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करेंगी।
डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान की उपनिदेशक मोनिका रानी टूटी ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, कलाकारों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि झारखंड की पारम्परिक चित्रकला शैलियां- सोहराय, जादू पटिया एवं पैतकर – भगवान बिरसा मुंडा के जीवन एवं विरासत को स्वदेशी कलात्मक अभिव्यक्तियों के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करेंगी। उन्होंने इसे एक महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट पहल बताते हुए कहा कि झारखंड की विविध पारम्परिक कला शैलियों के माध्यम से बिरसा मुंडा के जीवन को चित्रित करने का ऐसा प्रयास पहले बहुत कम हुआ है।
इस कार्यशाला का क्यूरेशन झारखंड के वरिष्ठ कलाकार एवं डीएसपीएमयू के प्रदर्शन एवं दृश्य कला विभाग के गेस्ट फैकल्टी श्री सी.आर. हेम्ब्रम द्वारा किया गया है। उन्होंने कार्यशाला की वैचारिक पृष्ठभूमि साझा करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य झारखंड की पारम्परिक जनजातीय चित्रकला परम्पराओं के माध्यम से भगवान बिरसा मुंडा के जीवन एवं विचारधारा को दृश्य रूप में प्रस्तुत करना है।
आईजीएनसीए के क्षेत्रीय केंद्र, रांची के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. कुमार संजय झा ने जनजातीय समुदायों एवं उनकी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कार्यशाला बिरसा मुंडा के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को कैनवास पर उकेरते हुए लोगों को उनके संघर्ष, विचारधारा एवं सामाजिक योगदान से परिचित कराएगी। उन्होंने युवा कलाकारों को कला एवं सांस्कृतिक परम्पराओं के माध्यम से झारखंड की समृद्ध विरासत के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार हेतु सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि भारत में इस प्रकार के प्रयोग पहले बहुत कम हुए हैं, जबकि संस्थान पूर्व में भी जनजातीय एवं पारम्परिक कला पर महत्वपूर्ण पहल कर चुका है। इसी क्रम में संतोकवा दुधात के निर्देशन में राठवा जनजाति के कलाकारों द्वारा निर्मित 1200 मीटर लंबा ‘महाभारत स्क्रॉल’ एक उल्लेखनीय उदाहरण है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि कार्यशाला में निर्मित कलाकृतियां भगवान बिरसा मुंडा के आदर्शों एवं जीवन दर्शन को समाज तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
प्रो. एस.एन. मुंडा ने अपने संबोधन में भगवान बिरसा मुंडा के जीवन एवं विरासत पर प्रकाश डालते हुए कलाकारों को उनके संघर्ष और योगदान के विभिन्न पक्षों को प्रभावशाली ढंग से चित्रित करने के लिए प्रेरित किया। वहीं डॉ. सोमा सिंह मुंडा ने कहा कि कला मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं को जीवित रखने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कलाकारों से अपनी कलाकृतियों में जीवन की ऊर्जा और सकारात्मकता को अभिव्यक्त करने का आग्रह किया।
श्री महादेव टोप्पो ने कलाकारों को बिरसा मुंडा के जीवन के प्रेरणादायक पक्षों को स्वतंत्र रूप से चित्रित करने के लिए प्रोत्साहित किया तथा कार्यशाला को पारम्परिक कला रूपों के माध्यम से प्रतिभा अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण मंच बताया।
सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. कमल कुमार बोस ने भी कलाकारों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि ये चित्र समाज में प्रेरणा और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेंगे। डॉ. विनोद कुमार ने कहा कि यह कार्यशाला बिरसा मुंडा के आदर्शों एवं दृष्टि को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बनेगी।
इस कार्यशाला में झारखंड की विभिन्न चित्रकला परम्पराओं से जुड़े प्रतिष्ठित पारम्परिक कलाकार सहभागी हो रहे हैं, जो अपनी-अपनी कला शैलियों के माध्यम से बिरसा मुंडा के जीवन एवं संघर्ष के विभिन्न पक्षों को प्रस्तुत करेंगे। सहभागी कलाकारों में पैतकर चित्रकला परम्परा से शालिनी सोय, किशोर गायेन एवं गणेश गायेन, जादू पटिया चित्रकला से सुधा कुमारी, सुचित्रा हेम्ब्रम एवं विपासा कुनारी, सोहराय चित्रकला से मनीष महतो एवं अनीता देवी तथा उरांव चित्रकला से सुमंती भगत एवं प्रीति वाला गाड़ी शामिल हैं।
इस पहल का उद्देश्य कलाकारों को रचनात्मक मंच प्रदान करने के साथ-साथ स्वदेशी कलात्मक परम्पराओं के माध्यम से भगवान बिरसा मुंडा के जीवन का दस्तावेज़ीकरण एवं सांस्कृतिक पुनर्पाठ करना है। उद्घाटन सत्र में कलाकारों, विद्वानों, विद्यार्थियों एवं संस्कृति प्रेमियों ने भाग लिया तथा दोनों संस्थानों द्वारा जनजातीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरुकता बढ़ाने हेतु की गई इस पहल की सराहना की।
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