यह बातें, रविवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, कवि-पत्रकार मिथिलेश कुमार सिन्हा द्वारा संपादित साझा काव्य-संकलन ‘आशिक़ाना मौसम’ का लोकार्पण करते हुए विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण ने कही। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में प्रेम का स्थान होता ही है। युवावस्था में मन आशिक़ाना होता है। उम्र के साथ यह प्रेम ईश्वर के प्रति मुख़ातिब हो जाता है। उन्होंने अनेक काव्य-पंक्तियों को उद्धृत कर प्रेम-काव्य के महत्त्व को रेखांकित किया।
समारोह के मुख्य अतिथि और पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हेमंत कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेम और मौसम मानव-जीवन में ख़ास स्थान रखते हैं। कवियों ने प्रेम को अनेक रूपों और भावों में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने भोजपुरी के एक गीत के माध्यम से प्रेम के अनमोल तत्त्वों पर सारगर्भित विचार रखे।
अपने अध्यक्षीय उद्गार में सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि प्रकृति और प्रेम मानव जाति को आदिकाल से संजीवनी देते आए हैं। भारतीय वांगमय में इसे मनुष्य का ‘पाँचवाँ पुरुषार्थ’ कहा गया है। प्रेम ऐसी शक्ति है, जो मृत में जीवन का संचार कर दे। महा-विनाशक युद्ध के द्वार पर खड़े संसार को आज और कुछ की नही, बस प्रेम की आवश्यकता है। इस संकलन के कवियों और कवयित्रियों ने प्रेम, ऋंगार और प्रकृति से जीवन-रस निकाल कर संसार को दिया है। संभवतः यह जीवन-औषधि का कार्य करें।
विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण ने संकलन के रचनाकारों डा अनिल सुलभ, मिथिलेश कुमार सिन्हा, डा मधु वर्मा, अनमोल श्रीवास्तव, डा पुष्पा जमुआर, डा शालिनी पाण्डेय, प्रदीप कुमार सिन्हा, प्रभात कुमार धवन, दुर्गेश मोहन, सिद्धेश्वर, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, रणजीत सिंह, कमल नयन श्रीवास्तव, चंदा मिश्र आदि को स्मृति-भेंट देकर सम्मानित किया।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन में संकलन के रचनाकारों के अतिरिक्त वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, डा एम के मधु, मोईन गिरिडिहवी, डा मनोज गोवर्धनपुरी, अरविन्द अकेला, कुमार अनुपम, जय प्रकाश पुजारी, इंदु भूषण सहाय, आदित्य कुमार तथा विजय कुमार ने भी अपनी रचनाओं के पाठ किए। अतिथियों का स्वागत सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा ने, धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने तथा मंच का संचालन कवि ब्रह्मांनद पाण्डेय ने किया।
व्यंग्य के ख्याति-लब्ध साहित्यकार बांके बिहारी साब, सम्मेलन के भवन अभिरक्षक प्रवीर कुमार पंकज, समाज सेवी संजीव कर्ण, पूनम प्रकाश, देवेन्द्र लाल आदि बड़ी संख्या में प्रबुद्ध श्रोता उपस्थित थे।
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