साहित्य सम्मेलन में मृत्युंजय गोविंद के ग़ज़ल-संग्रह ‘पत्थरों का शहर’ का हुआ लोकार्पण, हुई कवि-गोष्ठी

बिना कोई शोर मचाएँ अथवा मंचों पर ऊधम मचाए, निरंतर एकांतिक साधना में रत कवि मृत्युंजय गोविन्द की कविताएँ छायावादी और उत्तर-छायावादी काव्य-प्रवृत्तियों के बहुत निकट दिखाई देती हैं, जहाँ से एक रहस्य-लोक उजागर होता है। विम्ब और प्रतीकों के माध्यम से ये कविता के रहस्य-लोक तक भी पहुँचते हैं और पाठकों को उसके दिव्य आनन्द की अनुभूति भी कराते हैं।

Written By : डेस्क | Updated on: April 27, 2026 12:10 am

यह बातें, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित श्री गोविंद के ग़ज़ल-संग्रह ‘पत्थरों का शहर’ के लोकार्पण-समारोह और कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन-अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि गीत-गंधी 128 ग़ज़लों का यह खूबसूरत गुलदस्ता, विभिन्न रंग, रूप और गंध के पुष्पों के गुच्छ की भाँति ही, जीवन के अनेक रस, रूप और गंध लिए है। इसमें समाज की कारुणिक-वेदना भी है और प्रेम की झंकार भी। जीवन के प्रति महान आस्था भी और मूल्यों के हो रहे क्षरण का प्रतिरोध भी। जीवन के संघर्ष भी और संघर्षों की अंतः प्रेरणा भी।

अपने सुकुमार शब्दों से वितंडाओं पर कठोर प्रहार भी करते हैं, गोविन्द। “पाँव की मिट्टी पहाड़ों तक गयी होगी!” से लेकर “चाक चलती है, चिराग़ों से धुआँ उड़ाते हैं” तक इस कवि ने जीवन के हर बिंदु को स्पर्श करने की चेष्टा की है। कवि का लहजा रहस्यवादी है। इसलिए पाठकों को कवि की पंक्तियों के शाब्दिक-अर्थों के संसार से निकल कर बौद्धिक-धरातल पर पहुँचकर अर्थ का आलिंगन करना होगा।

पुस्तक का लोकार्पण करते हुए राज्य उपभोक्ता आयोग, बिहार के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा कि लोकार्पित पुस्तक की भाषा सरल किंतु विचार निगूढ़ हैं। पाठक गण अवश्य ही इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे।

अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन के साहित्यमंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि आज कंक्रीट के नगरों में पत्थर दिल लोगों का बसेरा हो रहा है। हृदय-शून्यता के इस काल में लोकार्पित पुस्तक के कवि श्री गोविंद ने अपनी ग़ज़लों से समाज की पीड़ा और मानवीय करुणा को मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’, उर्मिला वर्मा, चंदा वर्मा, वंदना सिन्हा, श्री पुरुषोत्तम, आद्या शिवम् और आद्या शांभवी ने भी अपने विचार व्यक्त किए और कवि को शुभकामनाएँ दीं।

कृतज्ञता-ज्ञापन के क्रम में पुस्तक के कवि श्री गोविंद ने अपनी ग़ज़लों का पाठ भी किया। इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, कुमार अनुपम, सुजाता मिश्र, रौशन वर्मा, इंदु भूषण सहाय, अश्विनी कविराज आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी काव्य-रचनाओं से समारोह को रसपूर्ण बना दिया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्णरंजन सिंह ने किया। प्रभात सिन्हा, राजेश कुमार, राज कुमार शर्मा, डा आनन्द वर्धन, नन्दन कुमार मीत, कुमारी मेनका, डौली कुमारी आदि बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।

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