यह बातें गुरुवार को, साँवलिया जी की 131वीं जयंती पर, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि,साँवलिया जी भारतीय विधि आयोग तथा बिहार राष्ट्र भाषा परिषद के भी माननीय सदस्य थे। उनका अखिल भारत वर्षीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन से भी, इसकी स्थापना के काल से ही गहरा जुड़ाव था। वे 1927के नवम्बर माह में, सोनपुर में आयोजित हुए विशेष अधिवेशन के सभापति बनाए गए थे। वे देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद के ममेरे अनुज तथा उन्हीं के समान बाल्य-काल से ही मेधावी थे। उन्होंने ‘युरोपीय महाभारत’, ‘गीता-विश्वकोष’, ‘अन्तर्राष्ट्रीय विधि’ समेत अनेक ग्रंथों का सृजन किया।
समारोह का उद्घाटन करते हुए, पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मान्धाता सिंह ने कहा कि समाज में कोई व्यक्ति अपने कर्मों और गुणों से पूजित होता है। साँवलिया बिहारी जी ऐसे ही साहित्यकार और विद्वान थे, जिन्हें उनके महान अवदानों के लिए स्मरण किया जाता है।
इस अवसर पर बर्मिंघम, इंग्लैंड से पधारे वरिष्ठ कवि और चिकित्सक डा कृष्ण कन्हैया को सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने अंग-वस्त्रम प्रदान कर अभिनन्दन किया।
कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। आज के अभिनन्दित कवि डा कृष्ण कन्हैया, वरिष्ठ कवि और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी बच्चा ठाकुर, डा रत्नेश्वर सिंह, कवयित्री आराधना प्रसाद, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय,सिद्धेश्वर, कुमार अनुपम, ईं अशोक कुमार, विभारानी श्रीवास्तव, मृत्युंजय गोविंद, मिथिलेश कुमार सिन्हा, नीरव समदर्शी, इन्दुभूषण सहाय, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, सुनीता रंजन, अश्विनी कुमार आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं के पाठ किए। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
ये भी पढ़ें :-साहित्य सम्मेलन में ‘लेख्य-मंजूषा’ के तत्त्वावधान में आयोजित हुई कथा-संगोष्ठी, “विह्वल हृदय धारा” का लोकार्पण भी