काव्य संग्रह तुम आओगे न..? से पहले नीलम जी का काव्य- संग्रह “नीलकमल” एवं गीत संग्रह “कल कल रागिनी” प्रकाशित हो चुकी हैं! अनेकों साझा संग्रहों में भी इनकी कविताएं संकलित है. अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में डॉ.सुरिंदर कौर नीलम की उपस्थिति लगातार बनी रहती है. रांची का कोई भी साहित्यिक मंच सुरिंदर जी के बिना अधूरा होता है. स्थानीय आकाशवाणी और दूरदर्शन में भी सुरिंदर जी की उपस्थिति नियमित रूप से होती है. संग्रह के प्रारंभ में कवयित्री ने लिखा है: “उस कारीगर को,/जिसने मेरे भीतर कविता का बीज गढ़ा/उस चित्रकार को,/जिसने इसमें रंग भरे ।”
इस समर्पण भाव से ही पता चलता है कि कवयित्री बहुतों की आभारी हैं! 144 पृष्ठ के इस संग्रह में 72 कविताओं को संग्रहित किया गया है. कविताएं बहुत लंबी नहीं हैं. कविताओं को पढ़कर एहसास होता है कि सामान्य सरल जिंदगी में गुजरने वाले दृश्य और तात्कालिक बड़ी छोटी घटनाएं कवयित्री के कोमल हृदय को प्रभावित करती हैं और कागज पर कविता के रूप में उतर जाती है.
कुछ कविताओं के शीर्षक को देखिए : तुम आओगे न, अलगनी पर कविता, पुस्तक, भूख, खामोशी, जाने क्यों, रसोईघर, जड़ें,स्त्रियां, धरतीपुत्र,अपने हिस्से का दर्द, गुरु गोविंद सिंह जी, गुलाब, सड़क, सवेरा,दंगल,संकल्प , कागा ,तीन रंग की चूड़ियां मेरी मन्नतें दीप इश्क का संबल, नैना और चाँद. इन कविताओं के शीर्षक देखकर इतना तो अनुमान हो ही जाता है कि कवयित्री की आँखें जहाँ भी जाती है उसे महसूस भी करती आहैं मानो उसे भी कुछ कहना है! देखिए कविता “जाने क्यों” : ” बनाने के लिए शहर की धुआंति
हवा में मकान ,/ मैने बेच दिया जमीन से जुड़ा,बाबा का पुश्तैनी घर”. इन पंक्तियों में आधुनिक जीवन की त्रासदी दिखती है. लगता है इस कालचक्र में सभी फंसते जाते हैं कोई अछूता नहीं है. सुरिंदर जी की भाषा सरल और बोधगम्य है. इन्होंने कहीं भी सायास कठिन शब्दों से परहेज किया है. संग्रह पठनीय है.
संग्रह: तुम आओगे न ?(कविता संग्रह),कवयित्री: डॉ.सुरिंदर कौर नीलम ,पृष्ठ:144,प्रकाशन: बोधि प्रकाशन, मूल्य: रु 225.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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