हिंदी में ही श्रेष्ठ समालोचक डॉ.नामवर सिंह ने कविताएं लिखीं,केदारनाथ सिंह तो कवि के रूप में अधिक लोकप्रिय हुए,डॉ.मैनेजर पाण्डेय उच्च कोटि के समालोचक रहे पर उन्होंने महत्वपूर्ण उपन्यास भी लिखे . डॉ.माया प्रसाद हिंदी की सम्मानित ,यशस्वी प्राध्यापक रहीं हैं .उन्होंने लगभग चार दशकों तक कॉलेज और विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य पढ़ाया .लगातार कहानी और कविताएं भी लिखती रही हैं . प्रस्तुत संग्रह ‘ हम जहाज के पाखी’ इनकी कविताओं का चौथा संग्रह है.
आज के दौर में जब लोग पुस्तकों की संख्या अधिक से अधिक बढ़ाने के लिए बहुत परेशान रहते हैं माया जी धैर्यपूर्वक कविताओं का सृजन करती रही हैं. इनकी कविताएं कोई उद्वेलित करने वाली कविता नहीं है, कोई तात्कालिक उन्माद भी पैदा नहीं करती पर आप इसे बार बार पढ़ें तो आपके विचारों को प्रभावित करती हैं. मायाजी की कविताओं में स्त्री विमर्श का वैचारिक मंथन है .ये कविताएं मानवीय संवेदना की कविताएं हैं , प्रोपेगेंडा की कविताएं नहीं हैं. संग्रह दो खंडों में विभक्त है.पहले खंड में संघर्ष ,पीड़ा का वर्णन है.
कुछ शीर्षक देखें 1.जरूरी तो नहीं,2.पतझड़ है 3.नाग फणियाँ 4. दर्द 5.मातम इत्यादि. अस्सी पृष्ठ के इस संग्रह के प्रारंभ में माया जी ने “समर्पण” में लिखा है, ‘चोंच में तिनके लिए/अब भी खड़ी हूं/तुम कहाँ हो/ – राज के लिए” .ये पंक्तियाँ कवयित्री के उस दुःख की ओर इशारा करती है जो उनके जीवनसाथी के जाने के बाद महसूस किया और आजन्म उन्हें झेलना है. प्रथम खंड की कविताओं को माया जी “दुष्काल की कविताएं “कहती हैं .इस खंड में 21कविताएं हैं. पहली ही कविता के पंक्तियों को देखिए: “रेहन में शब्द पर हम गीत गायें/जरूरी तो नहीं है।/दिलों में गन्ध की सैलाब हो/पर मुस्कुरायें ,/जरूरी तो नहीं है।” ( – जरूरी तो नहीं है) एक और कविता कीे पंक्तियाँ देखिए: ” अनसुलझे प्रश्नों से अकुलाएं प्राण,/। पुंछी हुई अधरों से अकुलाए प्राण;/पुंछी हुई अधरों से सुख की मुस्कान।/माला के मनके सब/ले गए अघोरी, /सत्ता के गलियों में/सपनों की चोरी/ दरक गए दर्पण सब, खोई पहचान,।/ अकुलाए प्राण।” (- प्रश्न अनसुलझे से) कवयित्री माया जी की भाषा प्रांजल है .
कविताओं में इन्होंने तत्सम और तद्भव शब्दों का बहुत ही समीचीन प्रयोग किया है . संग्रह के दूसरे खंड का नाम कवयित्री ने “जिंदगी का पुनर्पाठ” दिया है .इस खंड में इक्कतीस कविताएं हैं.छोटी छोटी कविताएं हैं .एक बानगी देखिए: “एक अरसे से उकेर रही हैं स्त्रियां,/ समय के शिला-पट्ट पर/अपनी पहचान का प्रमाण,/ अपने निजत्व की छाप छोड़ने का प्रयास,/ दुर्गम रास्ते पर रपटती/चोटिल होती उनकी/कोशिशें जारी हैं/………………………. जो घर जाते आपना चले हमारे साथ/
घेरे (घर के) को जलाने के नाम पर/ठिठक कर खड़ी हो जाती हैं स्त्रियां,/अभी भी खड़ी हैं.” ( – घेरा) माया जी की कविताओं में कबीर उपस्थित तो हैं पर उनसे कहीं व्यावहारिक असहमति भी है .दूसरे खंड की बहुत सारी कविताएं स्त्री विमर्श की गंभीर कविता है .
संग्रह का शीर्षक ‘ हम जहाज के पाखी ‘ भी कबीर से प्रभावित है.पूरे संग्रह में एक आध्यात्मिक अंतर्यात्रा का एहसास भी गंभीर पाठकों को मिलेगा! कवयित्री कुछ कविताओं को विस्तार देतीं तो पाठकों को और आनंद आता.संग्रह में कविताओं की संख्या भी बधाई जा सकती थी. संग्रह पठनीय और आप के पुस्तk की आलमारी की शोभा बढ़ाने लायक है.
संग्रह: हम जहाज़ के पाखी (कविता संग्रह),कवयित्री: डॉ. माया प्रसाद, पृष्ठ:80,प्रकाशक: विकल्प प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष: 2026.मूल्य:.रु.300

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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आपकी सारग्राही समीक्षा अच्छी लगी। कवि व समीक्षक दोनों को बधाई, शुभकामनाएँ ।