संस्कृति मंत्रालय की अत्यंत महत्त्वपूर्ण परियोजना राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन (एनएमसीएम) द्वारा उत्तर-पूर्वी हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम लिमिटेड (एनईएचएचडीसी) के सहयोग से आयोजित इस प्रदर्शनी का उद्घाटन पद्मश्री एवं प्रख्यात समाजसेवी श्री टेची गुबिन और आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने किया।
इस अवसर पर, भारत सरकार के उर्वरक विभाग की संयुक्त सचिव सुश्री बंदना प्रेयशी, आईजीएनसीए के डीन एवं एनएमसीएम के प्रभारी प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़, एनएमसीएम के निदेशक डॉ. मयंक शेखर और एनईएचएचडीसी के महेंद्र जोशी की गरिमामयी उपस्थिति रही। यह प्रदर्शनी जनपथ, नई दिल्ली स्थित आईजीएनसीए परिसर की दर्शनम्-1 एवं 2 गैलरी गैलरी (भू-तल) में 2 जुलाई 2026 तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी। उद्घाटन के बाद, अग्रगामी डांस एंड सिने ग्रुप ने सांस्कृतिक प्रस्तुति में पूर्वोत्तर की संस्कृति को जीवंत कर दिया।
परम्परागत बर्तनों की परम्परा घरों से गायब होती जा रही :डॉ. सच्चिदानंद जोशी
इस अवसर पर दो महत्त्वपूर्ण मोनोग्राफ – “बेल-मेटल क्राफ्ट ऑफ असम” (Bell-Metal Craft of Assam) तथा “चितेरी आर्ट ऑफ बुंदेलखंड” (Chiteri Art of Bundelkhand) का लोकार्पण भी किया गया। ये प्रकाशन भारतीय पारम्परिक कलाओं और शिल्प पर गंभीर शोध एवं प्रलेखन का महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, हमारे परम्परागत बर्तनों की परम्परा हमारे घरों से गायब होती जा रही है। हम अपनी परम्परा से हट रहे हैं। हमारे पूर्वज बहुत सोच-समझकर खाना बनाते और बर्तनों का प्रयोग करते थे, ताकि ज़रूरी पोषक तत्त्व हमारे शरीर को मिलें। हम विभिन्न तरह के प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन अपनी परम्परा के पास नहीं जा रहे हैं। ये प्रदर्शनी हमें अपनी परम्परा के पास ले जाएगी। उन्होंने ज्ञान भारतम् और बृहत्तर भारत परियोजना के बारे में बताते हुए कहा कि ज्ञान भारतम् के लिए 491 करोड़ और बृहत्तर भारत के लिए 55 करोड़ रुपये की राशि केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकृत की गई है। उन्होंने कहा, संस्कृति हर जगह है और हमारे जीवन का हिस्सा है।
टेची गुबिन ने कहा, इस तरह की प्रदर्शनियों से सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से नस्लीय संघर्ष नहीं होगा, आपसी समझ बढ़ेगी। उत्तर, मध्य, दक्षिण और पश्चिम भारत के लोगों को पूर्वोत्तर भारत के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूली पाठ्यक्रमों में पूर्वोत्तर के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए। देश के अन्य भागों की संस्कृति से जुड़ी प्रदर्शनियां पूर्वोत्तर भारत में भी होनी चाहिए।
बंदना प्रेयसी ने कहा, पूर्वोत्तर भारत के लोगों के लिए संस्कृति एक दिन या किसी ख़ास अवसर की चीज़ नहीं है। संस्कृति उनके ख़ून में है और उनके दैनिक जीवन में है। वहां की संस्कृति रंग भरी है। प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ ने प्रदर्शनी के बारे में विस्तार से बताया और आईजीएनसीए के विविध कार्यों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा, इतिहास में दस्तावेज़ीकरण बहुत महत्त्वपूर्ण है। लोगों को पता लगना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं। इससे पूर्व, डॉ. मयंक शेखर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की प्रस्तावना पेश की।
प्रदर्शनी के बारे में आज के औद्योगिक और मशीन-प्रधान समय में यह प्रदर्शनी भारत के पूर्वोत्तर अंचल की उन जीवित परम्पराओं को सामने लाती है, जो धातु, बांस और मिट्टी जैसे प्राकृतिक साधनों के माध्यम से सदियों से लोकजीवन का हिस्सा रही हैं। इन पारम्परिक बर्तनों में केवल उपयोगिता नहीं, बल्कि एक पूरे समाज की स्मृतियां, जीवन-पद्धति, प्रकृति-बोध और सांस्कृतिक पहचान समाहित है। यही कारण है कि इस तरह की प्रदर्शनियां केवल कला-प्रदर्शन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद का दुर्लभ अवसर बन जाती हैं।
प्रदर्शनी में प्रदर्शित वस्तुएं केवल संग्रहणीय कलाकृतियां नहीं हैं, बल्कि वे उन समुदायों की जीवित सांस्कृतिक स्मृतियां हैं, जिनके जीवन में आज भी पारम्परिक शिल्प, हस्तनिर्माण और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की परम्परा जीवित है।
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