सड़क पर टकराव के साथ ही इसका असर संसद के भीतर भी दिखा, जहां विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा और दोनों सदनों में जोरदार हंगामा हुआ। सीजेपी के संसद मार्च को देखते हुए राजधानी में सुरक्षा के पहले से ही पुख्ता इंतजाम किए गए थे। संसद मार्ग और आसपास का पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील रहा। कई मार्गों पर यातायात रोकना पड़ा और एहतियात के तौर पर केंद्रीय सचिवालय, उद्योग भवन, पटेल चौक, जनपथ तथा लोक कल्याण मार्ग समेत कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए। इससे हजारों यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। बाद में हालात सामान्य होने पर मेट्रो सेवाएं बहाल कर दी गईं।
संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन विपक्ष ने NEET पेपर लीक और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई का मुद्दा दोनों सदनों में उठाया। विपक्ष ने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया, जबकि सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस कार्रवाई को आवश्यक बताया। लगातार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही प्रभावित रही और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
आंदोलन के बीच महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह रहा कि सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त कर संसद मार्च में भाग लिया। बाद में संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार तथा पेपर लीक मामलों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई। नड्डा ने प्रतिनिधिमंडल की बातें सुनने और लिखित ज्ञापन स्वीकार किया।
दूसरी ओर आंदोलन का दूसरा प्रमुख चेहरा सोनम वांगचुक अपने अनिश्चितकालीन अनशन जारी रखने की जिद पर कायम हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताते हुए संबंधित अस्पतालों से विस्तृत चिकित्सकीय रिपोर्ट मांगी है।
आंदोलन को विपक्षी दलों का समर्थन भी मिला। आम आदमी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों के नेताओं ने प्रदर्शनकारियों के प्रति एकजुटता जताई और जंतर-मंतर पहुंचकर आंदोलन का समर्थन किया। भाजपा ने आरोप लगाया कि विपक्ष छात्र आंदोलन का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है, जबकि विपक्ष का कहना है कि वह छात्रों के मुद्दों और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार के समर्थन में खड़ा है। हालांकि किसी दल विशेष के कार्यकर्ताओं की संख्या या भूमिका को लेकर किए जा रहे दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
लगातार कई दिनों से चल रहा यह आंदोलन अब केवल परीक्षा प्रणाली तक सीमित नहीं रह गया है। सड़क पर बढ़ते टकराव, संसद में राजनीतिक संघर्ष और न्यायपालिका की निगरानी के बीच यह मुद्दा केंद्र सरकार के सामने एक बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बनकर उभरा है। अब निगाहें सरकार की अगली पहल, न्यायालय की सुनवाई और आंदोलन की आगामी रणनीति पर टिकी हैं।
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