अतिपठनीय है प्रो. नंदकिशोर नंदन का कहानी संग्रह “जब गांधी चुनाव लड़े “

आप सबने इस शीर्षक से मिलता जुलता हरिशंकर परसाई जी का एक व्यंग्य लेख पढ़ा होगा, पर "जब गांधी चुनाव लड़े " एक कहानी संग्रह है जिसमें इस शीर्षक की एक कहानी भी है. पेशे से हिंदी साहित्य के वरिष्ठ प्राध्यापक रहे डॉ. नंदकिशोर नंदन स्वभाव से पिछले छह दशकों से पिछड़ों, शोषितों की आवाज रहे हैं. सामंती सोच और व्यवस्था को अपनी रचनाओं में उजागर करते रहे हैं नंदन जी.

Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: August 19, 2026 11:30 pm

नंदन जी के एक दर्जन से अधिक पुस्तक प्रकाशित हैं. कविता, कहानी ,आलोचना की कई पुस्तकें प्रकाशित हैं. कबीर पर नंदन जी का विशेष अध्ययन है और काफी कुछ लिखा भी है इन्होंने. हिन्दी के लोकप्रिय, सम्मानित कवि गोपाल सिंह नेपाली से नंदन जी का निकट संपर्क रहा. उनकी कविताओं का संकलन और संपादन भी किया है. नेपाली जी पर नंदन जी ने दर्जनों लेख और संस्करण देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखा है. प्रस्तुत संकलन जब गांधी चुनाव लड़े नंदन जी की सृजनात्मक ऊर्जा का प्रत्यक्ष प्रमाण है. इस संग्रह की कहानियों के सारे पात्र, घटनाएँ आपको अपने आसपास के लगेंगे. इन कहानियों में कोई आयातित पात्र, घटना या विचार नहीं है. अपने आसपास घट रही घटनाओं को देखने, समझने और कथा रूप में लाने के लिए नंदन जैसी पैनी दृष्टि, निरपेक्ष भाव और सर्वहारा के प्रति सहानुभूति चाहिए।

नंदन की इन कहानियों में कोई इन्कलाब की आवाज नहीं है, विद्रोह करने, उकसाने की भी बात नहीं है, पर हाँ जहां मानवीय व्यावहार में विद्रूपता है उसे रेखांकित भी किया है. पुस्तक के प्रारंभ में हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार, सम्पादक महेश दर्पण ने विस्तार से सभी कहानियों का विश्लेषण किया है. 125 पृष्ठ के इस कथा संग्रह में चौदह कथाएं हैं. कथाकार ने इस संग्रह को प्रतिष्ठित लेखक और सम्पादक राजेंद्र यादव जी को समर्पित किया है.

कथाओं के शीर्षक की ओर ध्यान दें: 1.रात अभी कितनी  2. चीख 3. प्रजापालक 4. प्रतिरोध 5. अपनी-अपनी मौत 6. अपना -अपना हिस्सा 7. तीर्थयात्रा 8. तीसरी आंख का दर्द 9. मतदाता 10. सारे जहाँ से अच्छा…11. कुलभूषण बाबू का हिन्दुस्तान 12. कायदा 13. विवेकी संत बसे…14. जब गांधी चुनाव लड़े और अंत में पाठकों की कुछ प्रतिक्रियाएं.  अंतिम कहानी गांधी… एक बहुत ही प्रतीक रूप में लिखी कहानी है. जिन मूल्यों और आदर्शों को ध्यान में रखकर देश आजाद हुआ था वह बिखर गया. चुनाव की पूरी प्रक्रिया पर करारा व्यंग्य है यह कथा. कथाकार की भाषा प्रांजल प्रवाहमान है. इन्होंने कहीं भी अपने प्राध्यापक रूप को कथाकार के ऊपर हावी नहीं होने दिया है. संग्रह अति पठनीय और संग्रहणीय है.

संग्रह: जब गांधी चुनाव लड़े ( कथा संग्रह ),कथाकार: नंदकिशोर नंदन, पृष्ठ:125  प्रकाशन: अद्वैत प्रकाशन, मूल्य:  200 रुपये

( प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं। )

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