पारस पत्थर जैसा व्यक्तित्व था आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का : प्रो. अवधेश प्रधान

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि विभाग द्वारा ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व्याख्यान’ का आयोजन किया गया। ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी और भारतीय संस्कृति’ विषय पर आयोजित इस व्याख्यान के वक्ता थे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त आचार्य एवं हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अवधेश प्रधान। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। कलानिधि विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत भाषण एवं अतिथि परिचय प्रस्तुत किया।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए श्री रामबहादुर राय, मंच पर - प्रो. के. अनिल कुमार और प्रो. अवधेश प्रधान
Written By : डेस्क | Updated on: August 19, 2026 11:02 pm

अपने व्याख्यान में प्रो. अवधेश प्रधान ने प्रख्यात साहित्यकार एवं चिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य, चिंतन और भारतीय संस्कृति पर उनके विचारों को प्रस्तुत किया। उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी का साहित्य भारतीय संस्कृति को केवल अतीत की विरासत के रूप में देखने के बजाय उसकी निरंतर विकसित होती जीवन-दृष्टि के रूप में समझने का अवसर प्रदान करता है। उनके साहित्य में भारतीय परंपरा, लोकजीवन, इतिहास, दर्शन और आधुनिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

उन्होंने आचार्य द्विवेदी के निबंधों, उपन्यासों और आलोचनात्मक लेखन का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी दृष्टि भारतीय संस्कृति के मूल में निहित बहुलता, सहिष्णुता, संवाद और मानवीयता को रेखांकित करती है। उन्होंने अपने भाषण को इस बात से शुरू किया कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जिस सड़क पर चलते थे, वह उन्हीं से भरी हुई प्रतीत होती थी, ऐसा विराट व्यक्तित्व था उनका। गुरु को पारस पत्थर जैसा होना चाहिए, जो अपने शिष्यों को सोना बना दे। आचार्य द्विवेदी के पास से कोई भी छोटा होकर नहीं लौटता था, ऐसा बड़प्पन था उनमें। पारस पत्थर जैसा व्यक्तित्व था उनका। उन्होंने आगे कहा, आचार्य द्विवेदी मानते थे कि भारत का इतिहास राजाओं का, नवाबों का इतिहास नहीं है। भारत के जो लोग हैं, वही इसका जीता-जागता जीवंत इतिहास हैं।

अपने भाषण के समापन में उन्होंने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जिह्वा पर सरस्वती का वास था। वे कहते थे, जहां जल धारा और जन धारा मिलती है, वही तीर्थ है। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि भारत पर लिखी गई सभी भाषाओं की, सभी कविताओं का संकलन होना चाहिए।

अध्यक्षीय उद्बोधन में  रामबहादुर राय ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अवदान को स्मरण करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक चेतना को आधुनिक संदर्भों में समझने के लिए द्विवेदी जी का लेखन अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि ऐसे व्याख्यान भारतीय साहित्य और संस्कृति के विविध पक्षों पर गंभीर संवाद का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा, आज आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जितने सामयिक हैं, उतना कोई और नहीं है। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों एवं कला-संस्कृति प्रेमियों की सहभागिता रही। कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन कलानिधि विभाग की श्वेता सिंह ने किया।

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