यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका भारत की रूस से ऊर्जा और व्यापारिक निर्भरता खत्म करने को लेकर लगातार दबाव बनाता रहा है। लेकिन नई दिल्ली का मौजूदा कूटनीतिक रुख यह संकेत देता है कि भारत अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति की प्राथमिकताओं के आधार पर तय करने के बजाय अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के मुताबिक आगे बढ़ाना चाहता है। जयशंकर का मॉस्को पहुंचना और डोभाल का बीजिंग जाना इसी रणनीतिक स्वायत्तता की तस्वीर पेश करता है।
पुतिन के सामने मोदी का निजी संदेश
मॉस्को में जयशंकर ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उनका अभिवादन तथा निजी संदेश सौंपा। जयशंकर ने पुतिन से कहा कि मोदी उनसे आगामी SCO बैठक में मिलने की उम्मीद रखते हैं और सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में उनका स्वागत करने के लिए भी उत्सुक हैं।
मुलाकात में भारत-रूस आर्थिक सहयोग के विस्तार पर भी चर्चा हुई। व्यापार, ऊर्जा, उर्वरक और परमाणु सहयोग दोनों देशों के संबंधों के प्रमुख क्षेत्र हैं। पुतिन ने भी भारत के साथ बढ़ते व्यापार का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत रुचि और ध्यान की तारीफ की।
पुतिन का यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस के साथ भारत के आर्थिक रिश्ते अमेरिका की निगाह में हैं। इसलिए पुतिन का मोदी की व्यक्तिगत भूमिका को व्यापार वृद्धि से जोड़ना महज औपचारिक प्रशंसा नहीं, बल्कि दोनों देशों के रिश्तों की राजनीतिक अहमियत को भी रेखांकित करता है।
..और उसी वक्त डोभाल चीन में
जयशंकर की मॉस्को यात्रा के लगभग समानांतर अजित डोभाल का बीजिंग पहुंचना इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना देता है। डोभाल 25वीं भारत-चीन Special Representatives वार्ता में चीन के विदेश मंत्री और भारत-चीन सीमा प्रश्न पर चीन के विशेष प्रतिनिधि वांग यी के साथ बातचीत करेंगे। यह वार्ता 25 अगस्त को होनी है।
भारत और चीन के बीच 2020 के गलवान संघर्ष के बाद रिश्ते बेहद कठिन दौर में चले गए थे। सीमा पर सैन्य तनाव ने व्यापार, निवेश, आवाजाही और उच्चस्तरीय राजनीतिक संपर्कों तक को प्रभावित किया। ऐसे में डोभाल की बीजिंग यात्रा सिर्फ सीमा वार्ता नहीं है। इसके पीछे व्यापक उद्देश्य सीमा पर स्थिरता बनाए रखना और दोनों देशों के बीच सामान्य राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाना भी है।
Special Representatives तंत्र भारत-चीन सीमा विवाद पर उच्चस्तरीय राजनीतिक बातचीत का महत्वपूर्ण माध्यम है। डोभाल और वांग यी के बीच होने वाली यह 25वीं बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ समय में दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिखाई दिए हैं।
BRICS क्यों बन गया इस पूरी कूटनीति का केंद्र?
यहीं पर सितंबर में होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन इस पूरी कहानी को जोड़ देता है। BRICS मूल रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह के रूप में शुरू हुआ था। बाद के वर्षों में इसका विस्तार हुआ और मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया समेत कई देश इसमें शामिल हुए। इसका महत्व केवल सदस्य देशों की संख्या में नहीं है। यह समूह दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साझा मंच देता है और वैश्विक वित्त, व्यापार, विकास, ऊर्जा, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर सहयोग की कोशिश करता है।
भारत के लिए BRICS इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक साथ रूस और चीन जैसे उसके प्रमुख रणनीतिक साझेदार शामिल हैं, जबकि भारत खुद पश्चिमी देशों के साथ भी व्यापक आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते रखता है। यही वजह है कि BRICS भारत को ऐसी बहुपक्षीय कूटनीति का मंच देता है जिसमें वह अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए रूस और चीन के साथ भी संवाद जारी रख सकता है।
भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और सितंबर में नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को प्रस्तावित है। इस सम्मेलन की अहमियत इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि रूसी राष्ट्रपति पुतिन के भारत आने की तैयारी है और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी दिल्ली आने की संभावना जताई जा रही है। शी की यात्रा अगर होती है तो यह 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। यानी सितंबर में नई दिल्ली में एक ही मंच पर मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग की संभावित मौजूदगी भारत के लिए बड़ा कूटनीतिक अवसर होगी।
अमेरिका के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम ?
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संदेश निकलता है। अमेरिका चाहता है कि भारत चीन की बढ़ती ताकत को देखते हुए उसके साथ अधिक मजबूती से खड़ा हो और रूस के साथ अपने आर्थिक रिश्तों, खासकर ऊर्जा कारोबार, को सीमित करे। लेकिन भारत का मौजूदा रुख कुछ अलग तस्वीर पेश कर रहा है।
नई दिल्ली रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक रिश्तों को छोड़ने के बजाय उन्हें आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों में आगे बढ़ा रही है। दूसरी ओर चीन के साथ सीमा विवाद का समाधान भले अभी दूर हो, लेकिन भारत बातचीत के दरवाजे बंद नहीं करना चाहता। इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि भारत रूस और चीन के साथ मिलकर अमेरिका के खिलाफ कोई नया गठबंधन बना रहा है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अभी भी गंभीर मुद्दे हैं। रूस और चीन के साथ भारत के रिश्ते भी एक जैसे नहीं हैं।
लेकिन भारत का संदेश जरूर स्पष्ट दिखाई देता है—वॉशिंगटन भारत को रूस से दूरी बनाने या चीन के खिलाफ किसी एक रणनीतिक खेमे में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।भारत अपने लिए तीसरा रास्ता बनाए रखना चाहता है—अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, रूस के साथ पारंपरिक और आर्थिक संबंध तथा चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद।
मोदी की कूटनीति की असली परीक्षा
इस लिहाज से जयशंकर और डोभाल की यात्राएं अलग-अलग घटनाएं नहीं दिखाई देतीं। दोनों यात्राएं मिलकर भारत की उस विदेश नीति की तस्वीर पेश करती हैं जिसमें एक तरफ रूस को साधा जा रहा है, दूसरी तरफ चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश हो रही है और तीसरी तरफ अमेरिका को यह संकेत दिया जा रहा है कि भारत की विदेश नीति की अंतिम दिशा नई दिल्ली तय करेगी।
आने वाले कुछ सप्ताह इस रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। पहले SCO के मंच पर मोदी और पुतिन की संभावित मुलाकात, फिर नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन और उसके दौरान पुतिन तथा संभावित रूप से शी जिनपिंग की मौजूदगी—ये सभी घटनाएं भारत को एक साथ रूस और चीन के साथ उच्चस्तरीय संवाद का अवसर देंगी। खास बात यह है कि भारत इन दोनों देशों से बात ऐसे समय कर रहा है जब अमेरिका के साथ उसके अपने संबंध भी एक नए दौर से गुजर रहे हैं।
इसलिए जयशंकर का मॉस्को और डोभाल का बीजिंग दौरा केवल दो विदेश यात्राएं नहीं हैं। यह भारत की उस कूटनीतिक रणनीति का संकेत है जिसमें मोदी सरकार किसी एक महाशक्ति की छतरी के नीचे जाने के बजाय अमेरिका, रूस और चीन—तीनों के बीच अपने लिए रणनीतिक जगह बनाए रखने की कोशिश कर रही है। और सितंबर में दिल्ली में होने वाला BRICS सम्मेलन इस रणनीति का सबसे बड़ा मंच बनने जा रहा है।
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