रूसी तेल पर अमेरिका का शिकंजा, भारत पर 100% टैरिफ का खतरा

रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत और अमेरिका के रिश्ते नए तनावपूर्ण दौर में प्रवेश कर गए हैं। अमेरिकी कांग्रेस में विचाराधीन एक विधेयक में रूस से तेल खरीद जारी रखने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। यदि यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है तो भारत के अमेरिका को होने वाले अरबों डॉलर के निर्यात पर बड़ा असर पड़ सकता है। हालांकि विधेयक अभी अमेरिकी संसद की प्रक्रिया से गुजर रहा है और इसके अंतिम स्वरूप पर सहमति बनना बाकी है।

Written By : रामनाथ राजेश | Updated on: August 1, 2026 12:06 am

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देश लंबे समय से द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत होने के बावजूद व्यापार अब दोनों देशों के रिश्तों का सबसे संवेदनशील मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।

यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए प्रतिबंधों की नीति अपनाई। इसके उलट भारत ने रियायती कीमतों पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा। नई दिल्ली का तर्क है कि 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए तेल आयात का निर्णय केवल राष्ट्रीय हित और आर्थिक विवेक के आधार पर लिया जाएगा, किसी तीसरे देश के दबाव में नहीं।

अमेरिकी सांसदों का कहना है कि रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय उसके युद्ध प्रयासों को आर्थिक सहारा देती है। इसी वजह से रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ कड़े व्यापारिक कदम उठाने का प्रस्ताव रखा गया है। यदि यह लागू होता है तो भारत के वस्त्र, इंजीनियरिंग सामान, रत्न एवं आभूषण, ऑटो कंपोनेंट्स और अन्य निर्यात क्षेत्रों पर सीधा असर पड़ सकता है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ा है।

भारत सरकार ने संकेत दिया है कि वह अमेरिकी विधायी प्रक्रिया पर नजर रखे हुए है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। विदेश मंत्रालय पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि भारत की विदेश और ऊर्जा नीति स्वतंत्र है तथा राष्ट्रीय हितों के अनुरूप तय की जाती है।

हालांकि अमेरिकी कांग्रेस के भीतर भी इस प्रस्ताव को लेकर मतभेद हैं। कई सांसदों और व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि इतने व्यापक टैरिफ से वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित होगी, अमेरिकी उद्योगों की लागत बढ़ेगी और उपभोक्ताओं पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इसलिए विधेयक में संशोधन या इसके दायरे में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल व्यापार का नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक भू-राजनीति का भी संकेत है। रक्षा, प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत-अमेरिका की साझेदारी पहले से कहीं अधिक मजबूत है। ऐसे में दोनों देशों के सामने चुनौती यह होगी कि क्या वे व्यापारिक मतभेदों को रणनीतिक रिश्तों पर हावी होने देंगे या बातचीत के जरिए कोई ऐसा रास्ता निकालेंगे जिससे साझेदारी भी बनी रहे और दोनों देशों के आर्थिक हित भी सुरक्षित रहें।

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