राम मंदिर ट्रस्ट के CEO पद के लिए चयन प्रक्रिया बेहद व्यापक रही। कुल 5,585 आवेदन आए। प्रारंभिक जांच के बाद 1,580 उम्मीदवार योग्य पाए गए। इनमें से 108 को ऑनलाइन इंटरैक्टिव राउंड के लिए चुना गया और फिर 16 उम्मीदवारों का अयोध्या में आमने-सामने साक्षात्कार हुआ। अंतिम चरण में तीन नामों का पैनल तैयार किया गया। इन्हीं तीन में से जितेंद्र मिश्र का चयन किया गया। चयन समिति में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति परमोड कोहली, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) वी.के. चतुर्वेदी और परमाणु वैज्ञानिक डॉ. सुरेश हावरे शामिल थे।
चार दशक का सैन्य अनुभव
देवरिया के भोपतपुरा गांव से आने वाले जितेंद्र मिश्र ने 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन लिया था। करीब चार दशक के सैन्य करियर में वह फाइटर पायलट, फाइटर कॉम्बैट लीडर और एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट रहे। उनके पास 3,000 घंटे से अधिक उड़ान का अनुभव है और उन्होंने 18 से अधिक प्रकार के लड़ाकू, परिवहन विमान और हेलिकॉप्टर उड़ाए हैं।
उन्होंने फाइटर स्क्वाड्रन की कमान संभालने के अलावा HAL नासिक और बेंगलुरु स्थित एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टैब्लिशमेंट में चीफ टेस्ट पायलट के रूप में काम किया। वह दो महत्वपूर्ण एयर बेस की कमान संभाल चुके हैं और डिप्टी चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (ऑपरेशंस) जैसे अहम पद पर भी रहे।
कारगिल में तकनीकी भूमिका
कारगिल युद्ध के दौरान मिश्र उस टीम का हिस्सा थे जिसने Mirage-2000 विमानों में लेजर-गाइडेड बमों की क्षमता को तेजी से ऑपरेशनल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन हथियार प्रणालियों का इस्तेमाल कारगिल में महत्वपूर्ण पाकिस्तानी ठिकानों को निशाना बनाने में किया गया था। इसलिए उनकी भूमिका को सीधे फ्रंटलाइन स्क्वाड्रन कमांडर के बजाय कारगिल अभियान की ऑपरेशनल और तकनीकी क्षमता मजबूत करने वाले अधिकारी के रूप में देखा जाता है।
ऑपरेशन सिंदूर में पश्चिमी मोर्चे की कमान
मिश्र के सैन्य करियर का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय ऑपरेशन सिंदूर रहा। उन्होंने 1 जनवरी 2025 को पश्चिमी वायु कमान के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पद संभाला। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में हुई हवाई कार्रवाई की पश्चिमी मोर्चे की कमान उनके पास थी। इस अभियान में भूमिका के लिए उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल (SYSM) से सम्मानित किया गया। इससे पहले उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM) और विशिष्ट सेवा मेडल (VSM) भी मिल चुके हैं।
देवरिया से वायुसेना के शीर्ष तक
मिश्र की पारिवारिक पृष्ठभूमि शिक्षा से जुड़ी रही है। उनके पिता नथुनी मिश्र दिल्ली विश्वविद्यालय में कॉमर्स के प्रोफेसर रहे। उनके भाई डॉ. देवेंद्र मिश्र चिकित्सा क्षेत्र में हैं, जबकि बहन डॉ. वंदना मिश्र जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बताई जाती हैं। 30 अप्रैल 2026 को वायुसेना से सेवानिवृत्त होने के कुछ ही महीने बाद उन्हें राम मंदिर ट्रस्ट की महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी मिलना उनके लंबे पेशेवर अनुभव की अहमियत को दर्शाता है।
भगचंदका संभालेंगे खजाने की जिम्मेदारी
ट्रस्ट में शामिल किए गए 68 वर्षीय महेश भगचंदका दिल्ली के कारोबारी और समाजसेवी हैं। वह अशोक सिंघल फाउंडेशन से जुड़े रहे हैं और विश्व हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के रिश्तेदार बताए जाते हैं। राम मंदिर आंदोलन से उनका पुराना जुड़ाव रहा है। वह राम मंदिर के भूमि पूजन और प्राण प्रतिष्ठा समारोहों से भी जुड़े रहे हैं। श्रीराम वन गमन यात्रा के तहत 222 स्थानों पर राम स्तंभ स्थापित करने के कार्य में भी उनकी भूमिका बताई गई है। उन्हें ट्रस्ट का कोषाध्यक्ष बनाया गया है।
राम जन्मभूमि मुकदमे के पुराने पैरोकार
74 वर्षीय मदन मोहन पांडे अयोध्या के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। उन्होंने 1990 से 2019 तक राम जन्मभूमि मामले की कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह श्रीराम लला विराजमान और महंत रामचंद्र परमहंस की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर चुके हैं। पांडे उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता भी रह चुके हैं। उनकी नियुक्ति से ट्रस्ट को राम जन्मभूमि मामले के लंबे कानूनी अनुभव का लाभ मिलने की उम्मीद है।
पहली महिला ट्रस्टी
66 वर्षीय डॉ. निर्मला यादव ट्रस्ट की पहली महिला सदस्य बनी हैं। शिकोहाबाद की रहने वाली यादव हिंदी और संस्कृत में स्नातकोत्तर तथा पीएचडी हैं। वह करीब 19 वर्ष तक कॉलेज की प्राचार्य रहीं और लगभग 15 वर्ष तक विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की सदस्य भी रहीं। उनके पास शिक्षा और संस्थागत प्रशासन का लंबा अनुभव है। उनकी नियुक्ति ट्रस्ट में महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
चार नियुक्तियों में दिखी नई रणनीति
ट्रस्ट के इस पुनर्गठन में चार अलग-अलग तरह के अनुभव एक साथ दिखाई देते हैं। जितेंद्र मिश्र सैन्य नेतृत्व और बड़े संस्थान के संचालन का अनुभव लेकर आए हैं। भगचंदका के पास वित्त और सामाजिक नेटवर्क, पांडे के पास राम जन्मभूमि मामले का कानूनी अनुभव, जबकि यादव के पास शिक्षा और संस्थागत प्रशासन का अनुभव है। मंदिर निर्माण के बाद अब चुनौती केवल मंदिर परिसर को विकसित करने की नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं के आवागमन, सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, दान-चढ़ावे, सुविधाओं और विस्तार परियोजनाओं को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने की है। ऐसे में ट्रस्ट का यह नया ढांचा संकेत देता है कि अब उसका जोर निर्माण से आगे बढ़कर पेशेवर प्रबंधन और दीर्घकालिक प्रशासन पर है।
राममंदिर में चढ़ावा चोरी बनी वजह
राममंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला पहली बार 7 जून 2026 को सार्वजनिक हुआ। बाद की जांच में सामने आया कि चोरी की घटनाएं इससे पहले से चल रही थीं और 27 अप्रैल से 5 जून के बीच गिनती कक्ष में रुपये छिपाने के करीब 70 मामले हुए। 25 जून को दर्ज FIR में अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय, रमाशंकर मिश्रा, सुभाष चंद्र श्रीवास्तव और रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू को नामजद किया गया और सभी आठ को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें टिन्नू यादव ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय का ड्राइवर था। जांच के दौरान करीब 79.85 लाख रुपये बरामद किए गए। मामले ने मंदिर की चढ़ावे की व्यवस्था और निगरानी पर देशव्यापी सवाल खड़े किए। इसी विवाद के बीच चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे की खबर सामने आई। बाद की SIT जांच में चंपत राय को आरोपी नहीं बनाया गया। राममंदिर में चढ़ावा चोरी के कारण राष्ट्रीय स्तर पर हुई फजीहत के कारण ही नई नियुक्ति का निर्णय लेना पड़ा।
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