नई दिल्ली घोषणापत्र में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि आतंकवाद के मुद्दे पर दिखाई दी। ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों की कड़ी निंदा करते हुए आतंकवाद के वित्तपोषण, आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया। घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की निंदा और आतंकवाद के खिलाफ किसी भी तरह के दोहरे मानदंड को अस्वीकार करने की बात भारत के रुख को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती देती है।
पश्चिम एशिया संकट पर संयम और कूटनीति का संदेश
ब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब पश्चिम एशिया में तनाव बेहद गंभीर बना हुआ है। घोषणापत्र में क्षेत्र में बढ़ती हिंसा पर गंभीर चिंता जताते हुए अधिकतम संयम, तत्काल तनाव कम करने और राजनीतिक-कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया गया। नागरिक आबादी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा तथा मानवीय सहायता को निर्बाध बनाए रखने की जरूरत भी रेखांकित की गई। गाजा संकट के संदर्भ में युद्धविराम और स्थायी राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने पर जोर दिया गया।
ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों और परमाणु सुरक्षा से जुड़े जोखिमों के बीच ब्रिक्स का यह रुख खास महत्व रखता है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे अलग-अलग रणनीतिक हित वाले देशों के एक ही मंच पर होने के बावजूद घोषणापत्र पर सहमति बनना इस समूह की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका को दर्शाता है।
यूक्रेन पर भी बातचीत और राजनीतिक समाधान की पैरवी
यूक्रेन सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर भी ब्रिक्स ने सैन्य टकराव के बजाय बातचीत, मध्यस्थता और कूटनीति को प्राथमिक रास्ता बताया। घोषणापत्र में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। ब्रिक्स ने संघर्षों की जड़ों को समझकर तनाव कम करने और राजनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
अमेरिका की टैरिफ नीति को परोक्ष चुनौती
नई दिल्ली घोषणापत्र का एक महत्वपूर्ण आर्थिक संदेश एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ व्यापारिक बाधाओं के विरोध के रूप में सामने आया। ब्रिक्स देशों ने संरक्षणवादी व्यापार नीतियों से वैश्विक व्यापार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने वाले असर पर चिंता जताई। एकतरफा आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंधों के इस्तेमाल को भी आलोचनात्मक नजर से देखा गया।
हालांकि भारत ने ब्रिक्स को किसी एक देश या पश्चिमी दुनिया के खिलाफ गठबंधन के रूप में पेश करने से परहेज किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट रूप से ब्रिक्स को सहयोग, विकास और वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने वाला मंच बनाए रखने पर जोर दिया। यही वजह है कि घोषणापत्र में अमेरिकी डॉलर को छोड़ने अथवा तत्काल कोई साझा ब्रिक्स मुद्रा शुरू करने का फैसला नहीं हुआ। इसके बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर व्यावहारिक सहयोग आगे बढ़ाने की सहमति बनी।
डॉलर के विकल्प की दिशा में धीरे-धीरे कदम
ब्रिक्स की भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सदस्य देशों के भुगतान और मैसेजिंग सिस्टम के बीच बेहतर संपर्क और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटाने की संभावनाओं पर काम जारी रखने का फैसला हुआ। ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स इस दिशा में व्यावहारिक समाधान तलाश रही है। न्यू डेवलपमेंट बैंक को भी स्थानीय मुद्राओं में वित्तपोषण बढ़ाने और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाने की दिशा में प्रोत्साहित किया गया है।
संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में सुधार पर भारत को समर्थन
नई दिल्ली सम्मेलन में भारत की एक प्रमुख कूटनीतिक प्राथमिकता को भी व्यापक समर्थन मिला। ब्रिक्स ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं में सुधार की जरूरत दोहराई और विकासशील देशों को निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग की। विशेष रूप से भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का उल्लेख किया गया, जबकि चीन और रूस ने भारत तथा ब्राजील की भूमिका बढ़ाने के समर्थन को दोहराया।
यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रह गया है। इसके विस्तार के बाद यह एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाता है और वैश्विक दक्षिण की सामूहिक राजनीतिक तथा आर्थिक आवाज को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।
मोदी-शी मुलाकात से भारत-चीन संबंधों में नई कोशिश
सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति और स्थिरता को भारत-चीन संबंधों के व्यापक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना। व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, बाजार पहुंच और दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों में असंतुलन जैसे मुद्दों पर भी बातचीत हुई।
शी का भारत दौरा कई वर्षों बाद हुआ है और मोदी-शी बातचीत को दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों के बीच संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सीमा विवाद का अंतिम समाधान अभी दूर है, लेकिन संवाद और सीमा पर शांति को आर्थिक तथा द्विपक्षीय संबंधों के लिए आधार मानना नई दिल्ली की व्यावहारिक कूटनीति को दर्शाता है।
मोदी-पुतिन बातचीत से रूस के साथ रणनीतिक रिश्तों का संकेत
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात ने भी सम्मेलन को अलग रणनीतिक आयाम दिया। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग के साथ-साथ यूक्रेन संकट और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई। भारत ने रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को कायम रखते हुए पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों में संतुलन की नीति भी जारी रखी।
एआई से लेकर स्वास्थ्य और तकनीक तक नई साझेदारी
नई दिल्ली घोषणापत्र केवल भू-राजनीति तक सीमित नहीं रहा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं तकनीक, क्वांटम तकनीक, विनिर्माण, कृषि, छोटे और मध्यम उद्योग तथा कौशल विकास को ब्रिक्स सहयोग के नए क्षेत्रों के रूप में आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।
एआई के विकास और नियमन में सुरक्षा, विश्वसनीयता और विकासशील देशों की जरूरतों को प्राथमिकता देने की बात कही गई। भारत की ओर से डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुभव को साझा करने, स्वास्थ्य सहयोग बढ़ाने और विनिर्माण क्षेत्र के डिजिटल परिवर्तन के लिए संस्थागत सहयोग की पहल भी सामने आई।
ऊर्जा सुरक्षा पर विकसित देशों की नीति से अलग रुख
ऊर्जा के मुद्दे पर भी ब्रिक्स ने विकासशील देशों की वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता देने वाला रुख अपनाया। घोषणापत्र में न्यायपूर्ण, व्यवस्थित, समान और समावेशी ऊर्जा संक्रमण की बात कही गई, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया गया कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में जीवाश्म ईंधन अभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।
इसलिए ऊर्जा परिवर्तन के दौरान प्रत्येक देश की परिस्थितियों, विकास की अवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया। महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर सहयोग बढ़ाने की बात भी सामने आई।
भारत ने ब्रिक्स को ‘विरोध का मंच’ बनने से रोका
नई दिल्ली सम्मेलन का सबसे बड़ा राजनीतिक निष्कर्ष यह है कि ब्रिक्स का विस्तार तो हो रहा है, लेकिन भारत इसे किसी पश्चिम-विरोधी सैन्य या राजनीतिक गुट में बदलने के पक्ष में नहीं है। चीन और रूस जहां वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में पश्चिमी निर्भरता कम करने की दिशा में अधिक तेज कदम चाहते हैं, वहीं भारत ने आर्थिक सहयोग और स्थानीय मुद्रा भुगतान को बढ़ावा देते हुए भी मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को पूरी तरह तोड़ने के बजाय उसमें सुधार का रास्ता चुना।
यही भारत की अध्यक्षता की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक विशेषता रही—ब्रिक्स को टकराव का नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया में सहयोग और संतुलन का मंच बनाए रखना।
आगे की दिशा
नई दिल्ली घोषणापत्र के साथ भारत ने 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान वैश्विक दक्षिण, आर्थिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार को एक साझा एजेंडे में पिरोने की कोशिश की है। घोषणापत्र में भारत की अध्यक्षता की सराहना करते हुए 2027 में चीन को ब्रिक्स की अध्यक्षता सौंपने और अगले शिखर सम्मेलन के चीन में आयोजित होने का समर्थन किया गया।
कुल मिलाकर नई दिल्ली में ब्रिक्स का संदेश साफ है—दुनिया अब केवल कुछ शक्तिशाली देशों द्वारा तय नहीं होगी। विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में अधिक निर्णायक भूमिका चाहती हैं। आतंकवाद पर कठोर रुख, पश्चिम एशिया और यूक्रेन जैसे संकटों पर कूटनीतिक समाधान, एकतरफा व्यापारिक प्रतिबंधों का विरोध, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, तकनीकी सहयोग और संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग ने भारत की अध्यक्षता वाले इस सम्मेलन को केवल एक वार्षिक बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति-समीकरण में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत बना दिया है।
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