20 राउंड की मतगणना के बाद घोषित परिणाम में ABVP के यश डबास ने अध्यक्ष पद पर 24,576 वोट हासिल किए। NSUI के विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। यानी अध्यक्ष पद पर जीत का अंतर 2,053 वोट रहा।
सचिव पद पर ABVP की रिया छावड़ी को 21,650 वोट मिले, जबकि NSUI की नम्रता चौधरी को 14,869 वोट मिले। संयुक्त सचिव पद पर ABVP के लक्ष्य राज सिंह 16,615 वोट लेकर विजयी हुए। NSUI के गोपाल चौधरी को 15,206 वोट मिले, जबकि निर्दलीय विशेष यादव को 15,778 वोट मिले।
सबसे बड़ा अंतर उपाध्यक्ष पद पर देखने को मिला। पूर्व NSUI सदस्य दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में 30,615 वोट हासिल किए। ABVP के ईशु मौर्य को 16,910 और NSUI के वीर चतरथ को केवल 4,313 वोट मिले। इस तरह शौकीन ने ABVP उम्मीदवार से 13,705 और NSUI उम्मीदवार से 26,302 वोट अधिक हासिल किए।
यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि शौकीन पहले NSUI से जुड़े रहे थे और इस बार निर्दलीय मैदान में उतरे। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उनकी जीत ने 17 साल बाद डूसू में किसी निर्दलीय उम्मीदवार की केंद्रीय पद पर वापसी भी दर्ज की।
2025 में भी तीन पद ABVP के पास थे
2025 के चुनाव में भी तस्वीर काफी हद तक ABVP के पक्ष में थी। आर्यन मान ने अध्यक्ष पद जीता, कुणाल चौधरी सचिव बने और दीपिका झा ने संयुक्त सचिव पद हासिल किया। उपाध्यक्ष पद NSUI के राहुल झांसला ने जीता था। यानी 2025 में भी ABVP के पास चार में से तीन केंद्रीय पद थे।
2025 के प्रमुख आंकड़े भी इस बदलाव को समझने में मदद करते हैं। अध्यक्ष पद पर आर्यन मान को 28,821 और NSUI की जोस्लिन नंदिता चौधरी को 12,645 वोट मिले। उपाध्यक्ष पद पर NSUI के राहुल झांसला को 29,339 और ABVP के गोविंद तंवर को 20,547 वोट मिले। सचिव पद पर ABVP के कुणाल चौधरी को 23,779 और NSUI के कबीर को 16,117 वोट मिले, जबकि संयुक्त सचिव पद पर दीपिका झा को 21,825 और NSUI के लवकुश भड़ाना को 17,380 वोट मिले।
2024 में कहानी बिल्कुल अलग थी
2024 का चुनाव इस पूरे क्रम में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। उस वर्ष NSUI ने सात साल के अंतराल के बाद अध्यक्ष पद पर वापसी की थी। रौनक खत्री ने 20,207 वोट लेकर ABVP के ऋषभ चौधरी को हराया, जिन्हें 18,868 वोट मिले। NSUI ने अध्यक्ष के साथ संयुक्त सचिव पद भी जीता। दूसरी ओर ABVP ने उपाध्यक्ष और सचिव पद अपने नाम किए।
उपाध्यक्ष पद पर ABVP के भानु प्रताप सिंह को 24,166 और NSUI के यश नांदल को 15,404 वोट मिले। सचिव पद पर ABVP की मित्रविंदा करनवाल 16,703 वोट के साथ विजयी रहीं। संयुक्त सचिव पद पर NSUI के लोकेश चौधरी ने 21,975 वोट हासिल कर ABVP के अमन कपासिया को 6,726 वोट से हराया।
आंकड़ा बताता है कि 2024 में NSUI की वापसी के बाद 2025 में ABVP ने फिर तीन केंद्रीय पद हासिल किए और 2026 में भी तीन पद अपने पास रखे। फर्क यह रहा कि 2026 में NSUI के पास एक भी केंद्रीय पद नहीं आया और उपाध्यक्ष की सीट भी उसके पूर्व सदस्य रहे निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में चली गई।
2026 का चुनाव सामान्य परिस्थितियों में नहीं हुआ। मतदान से केवल 12 दिन पहले दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक छात्र PG की इमारत ढहने की घटना हुई थी। हादसे में सात लोगों की मौत हुई, जिनमें पांच दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र थे। चुनाव से पहले छात्र आवास, सुरक्षा और हॉस्टल का मुद्दा इसलिए प्रमुख हो गया।
चुनावी अभियान में भी इसका असर दिखाई दिया। छात्र संगठनों ने सुरक्षित और सस्ते आवास, हॉस्टल, किराये और सुरक्षा को प्रमुख मुद्दा बनाया। ThePrint ने रिपोर्ट किया कि हादसे के बाद इस बार DUSU अभियान में छात्र आवास और सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा प्रमुख हो गए।
इसलिए 2026 के परिणाम को केवल पारंपरिक ABVP-NSUI मुकाबले के रूप में देखना अधूरा होगा। यह वह चुनाव भी था जिसमें छात्र आवास और सुरक्षा जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में थे। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है कि सत्य निकेतन हादसे ने किस संगठन के पक्ष या विपक्ष में कितने वोट प्रभावित किए।
NSUI के लिए सवाल: मुद्दे थे, लेकिन वोट क्यों नहीं?
NSUI ने हॉस्टल, सस्ते किराये और छात्र समस्याओं को अपने अभियान में जगह दी थी। चुनाव से पहले छात्र आंदोलनों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को भी उसने उठाया। लेकिन अंतिम परिणाम में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव—चारों केंद्रीय पद उसके हाथ से निकल गए। जनसत्ता ने भी अपने चुनाव विश्लेषण में सत्य निकेतन हादसे, हॉस्टल मुद्दे और युवाओं से जुड़े अभियानों को NSUI की चुनावी चुनौती के संदर्भ में उठाया है।
खास बात यह है कि अध्यक्ष पद पर NSUI पूरी तरह मुकाबले से बाहर नहीं थी। विजय शंकर मीणा के 22,523 वोट यह बताते हैं कि मुकाबला करीब था और ABVP के यश डबास की जीत केवल 2,053 वोट के अंतर से हुई। लेकिन उपाध्यक्ष पद पर NSUI की स्थिति बेहद कमजोर रही—उसके उम्मीदवार को सिर्फ 4,313 वोट मिले, जबकि पूर्व NSUI सदस्य दीपांशु शौकीन 30,615 वोट लेकर विजयी हुए।
कॉकरोच जनता पार्टी का क्या रहा?
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को लेकर भी एक अलग तथ्य सामने आता है। अगस्त 2026 में CJP ने चुनावी राजनीति से फिलहाल दूरी बनाकर सामाजिक संगठन के रूप में काम करने का फैसला घोषित किया था। इसलिए DUSU 2026 में उसके प्रदर्शन को चुनावी सीटों या वोटों के आधार पर मापना संभव नहीं है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक संगठन ने राजनीतिक दल के रूप में चुनाव लड़ने के बजाय सामाजिक संगठन और दबाव समूह के रूप में काम करने का निर्णय लिया था।
2026 का बड़ा संदेश क्या है?
तीन वर्षों के आंकड़ों में सबसे स्पष्ट तथ्य यह है कि DUSU की केंद्रीय राजनीति में ABVP की संगठनात्मक पकड़ 2025 और 2026 में मजबूत बनी रही, जबकि NSUI की 2024 वाली वापसी अगले दो चुनावों में केंद्रीय पदों में तब्दील नहीं हो सकी।
2024 में NSUI के पास दो केंद्रीय पद थे। 2025 में यह संख्या घटकर एक हुई और 2026 में शून्य हो गई। दूसरी ओर ABVP 2024 के दो पदों से 2025 में तीन और 2026 में भी तीन पदों तक पहुंची।
लेकिन 2026 के परिणाम की दूसरी बड़ी कहानी ABVP बनाम NSUI से बाहर निकलती है। निर्दलीय दीपांशु शौकीन की 30,615 वोटों वाली जीत ने दिखाया कि छात्र राजनीति में स्थापित संगठनों के बाहर भी किसी उम्मीदवार के लिए बड़ा समर्थन जुटाने की संभावना बनी हुई है। उनका पूर्व NSUI जुड़ाव इस परिणाम को और दिलचस्प बनाता है।
इस लिहाज से 2026 का DUSU परिणाम तीन अलग-अलग संकेत एक साथ देता है—ABVP की तीन केंद्रीय पदों पर निरंतर पकड़, NSUI का चारों केंद्रीय पदों से बाहर होना और पूर्व NSUI सदस्य दीपांशु शौकीन की निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बड़ी जीत। सत्य निकेतन त्रासदी और छात्र आवास-सुरक्षा का मुद्दा इस चुनाव की पृष्ठभूमि में जरूर रहा, लेकिन उपलब्ध परिणामों से यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी एक मुद्दे ने निर्णायक रूप से मतदान का रुख तय किया।
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