अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास आगे की कार्रवाई के लिए है। हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के अमेरिका को होने वाले आयात पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार देने का प्रस्ताव करता है।
भारत ने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के इस कदम पर 17 सितंबर को प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत घटनाक्रम पर करीबी नजर रख रहा है और 1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिकता है। मंत्रालय के अनुसार, भारत बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा खरीद जारी रखेगा। नई दिल्ली ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ हुई बातचीत में इस तरह के कदम के संभावित असर को भारत-अमेरिका संबंधों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के संदर्भ में भी उठाया है।
अमेरिका का यह कदम ऐसे समय आया है जब भारत हाल ही में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर चुका है। नई दिल्ली में हुए सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन समेत BRICS देशों के नेता मौजूद रहे। सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में सदस्य देशों के बीच व्यापार और निवेश के लिए स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल तथा सीमा-पार भुगतान के विकल्पों पर काम आगे बढ़ाने की बात कही गई है।
हालांकि, भारत ने BRICS की किसी साझा मुद्रा का समर्थन करने की घोषणा नहीं की है। लेकिन स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर बढ़ता जोर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर निर्भरता को लेकर चल रही बहस को जरूर नई गति देता है।
यहीं से भारत-अमेरिका के मौजूदा टैरिफ विवाद का बड़ा वैश्विक संदर्भ सामने आता है। रूस से तेल खरीदना भारत के लिए केवल व्यापार का सवाल नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है। दूसरी तरफ अमेरिका रूस के ऊर्जा राजस्व को यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में दबाव में लाने के लिए प्रतिबंधों और टैरिफ जैसे आर्थिक उपायों का इस्तेमाल करना चाहता है।
नए अमेरिकी विधेयक में रूस से सीधे अमेरिका आने वाले सामान पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान भी है। इसके अलावा रूस से तेल या गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के अमेरिकी आयात पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने और रूस पर लगे प्रतिबंधों को दरकिनार करने में मदद करने वाले कुछ देशों पर भी इसी तरह की कार्रवाई का प्रावधान है।
विधेयक में रूस के अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और रूस से जुड़ी तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर प्रतिबंध बढ़ाने के प्रावधान भी हैं। रूस के अलावा ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को जारी रखने के प्रावधान भी विधेयक में शामिल हैं। दरअसल, रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी टैरिफ का दबाव पिछले साल ही शुरू हो गया था। अगस्त 2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से होने वाले आयात पर रूस से तेल खरीदने के कारण 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। यह उस समय भारत पर लागू अन्य शुल्कों के अतिरिक्त था और 27 अगस्त 2025 से प्रभावी हुआ था।
अब 2026 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित नया विधेयक उस दबाव को एक और स्तर तक ले जाने की संभावना पैदा करता है। एक तरफ भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस सहित विभिन्न देशों से तेल खरीद जारी रखने की नीति पर कायम है और BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार तथा सीमा-पार भुगतान के विकल्पों को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। दूसरी तरफ अमेरिका रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए नए प्रतिबंध और टैरिफ का रास्ता अपना रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत-अमेरिका संबंधों के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा बाजार, BRICS की आर्थिक भूमिका और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की स्थिति को लेकर बहस को भी फिर केंद्र में ला दिया है
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