केवल माध्यम नहीं, उसमें निहित ज्ञान को भी संरक्षित करना जरूरी : प्रो. उमा कांजीलाल

 इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि प्रभाग की स्लाइड यूनिट द्वारा ‘द मैनेजमेंट ऑफ नॉन-प्रिंट मैटिरियल इन गैलरीज, लाइब्रेरीज, आर्काइव्स एंड म्यूजियम्स’ विषय पर 6 और 7 अक्टूबर को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इसका उद्घाटन सत्र 6 अक्टूबर को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) की कुलपति प्रो. उमा कांजीलाल के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुआ। सत्र की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की, जबकि दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय के डीन प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौड़ विशिष्ट अतिथि रहे। आईजीएनसीए के कलानिधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत वक्तव्य दिया। संगोष्ठी का संयोजन श्री सांस्कृतिक अभिलेखागार विभाग के प्रभारी वीरेंद्र बंगरू ने किया। संगोष्ठी का उद्देश्य गैर-मुद्रित एवं दृश्य-श्रव्य विरासत सामग्री के संरक्षण, दस्तावेजीकरण, डिजिटलीकरण और प्रसार से जुड़े समकालीन मुद्दों पर विशेषज्ञों के बीच संवाद को बढ़ावा देना है। इसमें देशभर के गैलरी, पुस्तकालय, अभिलेखागार और संग्रहालयों से जुड़े विशेषज्ञ, शोधकर्ता एवं पेशेवर भाग ले रहे हैं। ‘रीवाइंड एंड प्रिजर्व : जर्नी फ्रॉम एनालॉग टू डिजिटल’ प्रदर्शनी के उद्घाटन के साथ सत्र का शुभारम्भ हुआ।

‘रीवाइंड एंड प्रिजर्व : जर्नी फ्रॉम एनालॉग टू डिजिटल’ प्रदर्शनी का अवलोकन करते डॉ. सच्चिदानंद जोशी, प्रो. उमा कांजीलाल और उनको प्रदर्शनी के बारे में बताते हुए वीरेद्र बंगरू
Written By : डेस्क | Updated on: October 7, 2026 12:09 am

मुख्य अतिथि के रूप में  प्रो. उमा कांजीलाल ने कहा कि गैर-मुद्रित सामग्री के संरक्षण में केवल माध्यम को सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसमें निहित सूचना और ज्ञान को भी संरक्षित कर उसे अधिक से अधिक लोगों के लिए सुलभ बनाना आवश्यक है। इसके लिए संरक्षण, दस्तावेजीकरण, मेटाडेटा, डिजिटलीकरण और डिजिटल पहुंच को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। आगे उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), वर्चुअल रियलिटी और अन्य आधुनिक तकनीकों के माध्यम से सांस्कृतिक सामग्री को बहुभाषी और अधिक सुलभ बनाया जा सकता है। विभिन्न संस्थानों में बिखरे संग्रहों को आपस में जोड़कर एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक ज्ञान-तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर सामग्री के सर्वेक्षण, पंजीकरण और मेटाडेटा मानक विकसित करने तथा इस क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने पर जोर दिया।

उन्होंने यह भी कहा कि आईजीएनसीए विभिन्न संस्थानों के बीच सेतु की भूमिका निभा सकता है। इग्नू और आईजीएनसीए के सहयोग से संरक्षण, डिजिटलीकरण और अभिलेखीकरण के क्षेत्र में विशेष प्रशिक्षण तथा माइक्रो-क्रेडेंशियल पाठ्यक्रम विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि हम अलग-अलग प्रयासों के बजाय सहयोग, नेटवर्किंग और साझा संसाधनों के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को जीवंत स्मृति के रूप में संरक्षित करें।

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने गैर-मुद्रित सामग्री को भारत की सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उसके संरक्षण और डिजिटलीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि एनालॉग माध्यमों की सीमित आयु और तेजी से बदलती तकनीक के कारण समय रहते इन सामग्रियों का वैज्ञानिक संरक्षण आवश्यक है। इसके लिए देशव्यापी सर्वेक्षण कर उपलब्ध सामग्री और उसकी स्थिति का आकलन, विशेषज्ञों का राष्ट्रीय डेटाबेस तथा आवश्यक तकनीकी संसाधनों की व्यवस्था की जानी चाहिए। आगे उन्होंने कहा कि इस दिशा में आईजीएनसीए नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है। केंद्रीय स्तर पर पुराने और अप्रचलित माध्यमों के डिजिटलीकरण के लिए सुविधा केंद्र विकसित करने, संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने तथा संरक्षित सामग्री को भावी पीढ़ियों और आम जनता के लिए सुलभ बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने ‘रीवाइंड एंड प्रिजर्व : जर्नी फ्रॉम एनालॉग टू डिजिटल’ प्रदर्शनी को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा कि आईजीएनसीए का कलानिधि प्रभाग – संग्रहालय, पुस्तकालय, अभिलेखागार और दीर्घा (ग्लैम) – चारों घटकों का समन्वित स्वरूप है और इसे सांस्कृतिक संसाधनों के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने गैर-मुद्रित सामग्री के संरक्षण, सूचीकरण, डिजिटलीकरण और डिजिटल पहुंच को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि संग्रहालयों और अभिलेखागारों के सामने प्रशिक्षित विशेषज्ञों, मेटाडेटा मानकों और आधुनिक तकनीकी संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियां हैं। प्रोफेसर गौड़ ने पुरानी प्रदर्शनियों की सामग्री के संरक्षण के साथ उनके वर्चुअल रूपांतरण, विशेषज्ञों की उपलब्धता और सांस्कृतिक संसाधनों के प्रभावी प्रचार-प्रसार पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमारी सांस्कृतिक विरासत अतीत के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य की भी धरोहर है, इसलिए उसकी सीमित आयु को देखते हुए समय रहते उसका डिजिटलीकरण और व्यापक स्तर पर उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत वक्तव्य में अतिथियों, विद्वानों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी के विषय “द मैनेजमेंट ऑफ नॉन-प्रिंट मैटिरियल इन गैलरीज” की महत्ता को रेखांकित किया और ऑडियो-विजुअल, चित्र एवं अन्य सांस्कृतिक अभिलेखों के संरक्षण और प्रभावी प्रबंधन पर विचार-विमर्श की आवश्यकता बताई। वीरेंद्र बंगरू ने कहा कि गैर-मुद्रित सामग्री हमारी सांस्कृतिक विरासत का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें फोटो निगेटिव, ग्लास प्लेट, स्लाइड, ऑडियो-वीडियो टेप और माइक्रोफिल्म जैसी सामग्रियां शामिल हैं। इनमें भारत के लगभग डेढ़ सौ वर्षों से अधिक के दृश्य और श्रव्य इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा सुरक्षित है, लेकिन समय के साथ इनके खराब होने और उपयोग में आने वाली मशीनों के अप्रचलित होने का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इस विरासत के संरक्षण के लिए देशभर में उपलब्ध गैर-मुद्रित सामग्री का राष्ट्रीय स्तर पर सर्वेक्षण आवश्यक है।

इसके आधार पर संरक्षण, वैज्ञानिक देखभाल और डिजिटलीकरण की समुचित नीति बनाई जा सकती है। उन्होंने ऐसी सामग्री के डिजिटलीकरण के लिए एक राष्ट्रीय सुविधा केंद्र स्थापित करने तथा इस क्षेत्र में कार्यरत तकनीशियनों और विशेषज्ञों का डेटाबेस तैयार करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पुराने तकनीशियन और डार्करूम विशेषज्ञ हमारी जीवंत विरासत हैं। उनके साथ उनका अनुभव और तकनीकी ज्ञान भी लुप्त हो रहा है, इसलिए उनकी मौखिक स्मृतियों और कार्य-पद्धतियों का दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी और प्रदर्शनी अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि एक शुरुआत है।

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