इस विवाद में बिहार के पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव की एंट्री ने इसे राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया है। पप्पू यादव दिल्ली के संसद मार्ग थाने पहुंचे और धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ शिकायत देकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव भी इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जता चुके हैं। इस पूरे घटनाक्रम को 2027 के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में भी देखा जा रहा है। विपक्षी दलों के यादव नेताओं के लिए यह मुद्दा यादव समाज की धार्मिक और सामाजिक भावनाओं से जुड़कर राजनीतिक संवाद का माध्यम बन सकता है।
छतरपुर से टीकमगढ़ तक यादव महासभा का प्रदर्शन
धीरेंद्र शास्त्री के बयान के खिलाफ सबसे चर्चित विरोध उनके गृह जिले मध्य प्रदेश के छतरपुर में देखने को मिला। यहां यादव महासभा और भगवान श्रीकृष्ण के अनुयायियों ने डाकखाना चौराहे पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने धीरेंद्र शास्त्री के पुतले को जूते मारे और फिर उसे आग के हवाले कर दिया। इस दौरान ‘धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री मुर्दाबाद’ और ‘पाखंड की दुकान बंद करो’ जैसे नारे लगाए गए। प्रदर्शनकारियों ने जिला प्रशासन से उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उनका कहना था कि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण दोनों सनातन धर्म के आराध्य हैं। किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ बताने अथवा दूसरे के स्वरूप का उपहास करने वाली भाषा स्वीकार नहीं की जा सकती।
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में भी अखिल भारतीय यादव महासभा ने विरोध प्रदर्शन किया। महासभा के कार्यकर्ताओं ने गांधी चौराहे पर धीरेंद्र शास्त्री का पुतला जलाया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने पुतला जलाने से रोकने की कोशिश की, लेकिन कार्यकर्ताओं ने विरोध जारी रखा। महासभा ने भगवान श्रीकृष्ण पर की गई कथित टिप्पणी के लिए सार्वजनिक माफी और एफआईआर दर्ज करने की मांग की।
ग्वालियर में यादव समाज (यदुवंशी) संगठन मध्य प्रदेश के पदाधिकारियों ने पुलिस अधीक्षक को आवेदन सौंपकर धीरेंद्र शास्त्री के बयान की जांच और कानूनी कार्रवाई की मांग की। संगठन का कहना है कि सार्वजनिक धार्मिक मंच से इस तरह की टिप्पणी सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकती है। इस तरह मध्य प्रदेश के कम से कम तीन शहरों में यादव समाज के संगठनों की ओर से विरोध सामने आया है।
रायबरेली में अधिवक्ताओं का प्रदर्शन, राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन
विवाद अब वकीलों के बीच भी पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश के रायबरेली में 3 नवंबर को अधिवक्ताओं ने जिलाधिकारी कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। भगवान श्रीकृष्ण को लेकर की गई टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए उन्होंने धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ नारेबाजी की और एफआईआर दर्ज करने की मांग की। प्रदर्शनकारी अधिवक्ताओं ने राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा। उन्होंने मामले में कार्रवाई की मांग की।
इसके अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के अधिवक्ता कृष्ण कन्हैया पाल ने भी धीरेंद्र शास्त्री को कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में 15 दिनों के भीतर सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगने और भविष्य में ऐसी टिप्पणी नहीं करने का लिखित आश्वासन देने की मांग की गई है। अधिवक्ता ने ऐसा नहीं होने पर न्यायालय में आपराधिक शिकायत और दीवानी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है।
पप्पू यादव पहुंचे थाने, अखिलेश और तेजस्वी ने भी खोला मोर्चा
इस विवाद को राजनीतिक धार देने में विपक्ष के नेताओं की सक्रियता भी महत्वपूर्ण है। पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने दिल्ली के संसद मार्ग थाने में धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ शिकायत दी। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का अपमान किसी भी परिस्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने माफी को अपर्याप्त बताते हुए दोषी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मामले में कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रमों पर रोक लगाने और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उनका कहना है कि भगवान राम और कृष्ण दोनों एक ही दिव्य सत्ता के स्वरूप हैं। ऐसे में उनके बीच इस तरह की तुलना उचित नहीं है। बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी टिप्पणी को अशोभनीय और अमर्यादित बताया। उन्होंने कहा कि पहले ये लोग इंसानों को बांटते थे, अब भगवान को भी बांटने लगे हैं। तेजस्वी ने भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण को एक-दूसरे का पूरक बताया। कांग्रेस नेता भूपेश बघेल और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इस मामले में प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी और हिंदुत्व की राजनीति करने वाले नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं।
2027 चुनाव से पहले यादव समाज को एकजुट करने का राजनीतिक अवसर?
इस विवाद का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि अगले वर्ष उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यादव मतदाताओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। समाजवादी पार्टी का परंपरागत सामाजिक आधार भी यादव और मुस्लिम मतदाताओं के बीच रहा है।
ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण को लेकर उठा विवाद समाजवादी पार्टी के लिए धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक पहचान का मुद्दा बनाने का अवसर प्रस्तुत करता है। अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया को इसी राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जा सकता है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की राजनीति में भी यादव समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तेजस्वी यादव की प्रतिक्रिया से यह मुद्दा उत्तर प्रदेश तक सीमित न रहकर हिंदी पट्टी की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। पप्पू यादव की शिकायत ने भी इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया है।
धीरेंद्र शास्त्री की माफी के बाद भी क्यों नहीं थम रहा विवाद?
विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने वीडियो जारी कर सफाई दी और माफी मांगी। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण में भेद करने का उनका कोई इरादा नहीं था। वह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं। उनकी टिप्पणी को विनोद और भक्ति भाव में कही गई बात के रूप में समझा जाना चाहिए। लेकिन विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि सार्वजनिक मंच से दिए गए बयान की जिम्मेदारी भी सार्वजनिक रूप से ही तय होनी चाहिए। उनके मुताबिक केवल माफी मांग लेने से विवाद समाप्त नहीं हो जाता।
इस पूरे मामले में एक कानूनी पहलू भी महत्वपूर्ण है। अलग-अलग स्थानों पर पुलिस शिकायतें और ज्ञापन दिए गए हैं, लेकिन हर शिकायत को एफआईआर दर्ज होना नहीं माना जा सकता। पप्पू यादव की शिकायत पर भी पुलिस की ओर से एफआईआर दर्ज होने की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
अब धार्मिक विवाद से आगे बढ़कर चुनावी विमर्श का हिस्सा ?
धीरेंद्र शास्त्री का बयान अब कई स्तरों पर बहस का विषय बन गया है। एक तरफ यादव महासभा और कृष्ण भक्तों का विरोध है, दूसरी तरफ अधिवक्ताओं की कानूनी पहल है और तीसरी तरफ विपक्षी नेताओं की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हैं। 2027 के चुनावों से पहले यह विवाद किस हद तक राजनीतिक मुद्दा बनता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। लेकिन इतना जरूर है कि भगवान श्रीकृष्ण को लेकर उठे इस विवाद ने यादव समाज के विभिन्न संगठनों को अपनी नाराजगी सार्वजनिक करने का अवसर दिया है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि क्या यह विरोध केवल धीरेंद्र शास्त्री से माफी और कानूनी कार्रवाई की मांग तक सीमित रहता है या विपक्षी दलों के नेता इसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनावी विमर्श में भी आगे बढ़ाते हैं।
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