किताब का हिसाब (Book Review Natyashastra): हर घर में रखने लायक है “भरतमुनिप्रणीत नाट्यशास्त्र सम्पूर्ण हिंदी अनुवाद”

"....जैसे हम सभी अपने-अपने घरों में 'रामायण','महाभारत' की पुस्तकें रखते हैं, वैसे ही 'नाट्यशास्त्र' को भी प्रत्येक घरों तक पहुंचाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। समाज में इस शास्त्र का जितना विस्तार होगा, समाज से कटुता, विसंगतियां उतनी ही दूर जाएंगी।" -,परेश रावल अध्यक्ष, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी, नई दिल्ली

Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: November 5, 2024 2:09 pm

Book Review Natyashastra

आज चर्चा के लिए ली गयी पुस्तक भारत में प्राचीन काल से साहित्य, संस्कृति, नृत्य, अभिनय के गूढ़ रहस्यों को समझाने वाली अद्वितीय पुस्तक है. मूल संस्कृत में लिखी गयी पुस्तक आम पाठकों के लिए नहीं है. सैकड़ों सालों से विद्वानों ने साहित्य, कला, नाटक , संस्कृति के अध्येताओं को अपनी रुचि के अंश को पढ़कर पढ़ाया है. पहले भी कई विद्वानों ने इसका अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करवाया है पर वे सभी कई खंडों में थे.

प्रस्तुत पुस्तक एक ही खंड में सारे महत्वपूर्ण खंडों का चयन और अनुवाद विद्वान अनुवादक ने किया है. भारत के बहुभाषाविद विद्वान श्री राधाबल्लभ त्रिपाठी द्वारा अनुदित यह पुस्तक विद्यार्थियों, शिक्षकों, कलाकारों, नाट्यकर्मियों, अभिनेताओं, विज्ञापन कर्मियों, फिल्मकारों और नाट्य एवं फ़िल्म निर्देशकों इत्यादि के लिए अति महत्वपूर्ण होगी. इस पुस्तक में सैंतीस अध्याय हैं. कुछ अध्यायों के शीर्षक पर ध्यान दें. पांचवां अध्याय (पूर्वरंगविधान), सत्ताईसवाँ अध्याय( आतोद्यविधान ), तीसवां अध्याय (सुषिर विधान), इकतीसवां अध्याय (तालाध्याय) और पैंतीसवां अध्याय (भूमिका विकल्प). इस पुस्तक में सुंदर अनुवाद के द्वारा नाटक के सभी पहलुओं को समझाया गया है जो अभिनय से जुड़े किसी भी व्यक्ति के लिए एक आदर्श संदर्भ ग्रंथ होगा.

अनेक स्थानों पर विद्वान अनुवादक ने मूल संस्कृत श्लोकों का भी उद्धरण दिया है और फिर उसका सुंदर अनुवाद भी किया है. सैंतीसवें अध्याय के अंत में त्रिपाठी जी एक श्लोक का अर्थ बताते हैं कि : “देवता गंध तथा माला से पूजित होकर उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने नाट्य का प्रयोग करने वालों से प्रसन्न होते हैं (37.29.)”

Book Review Natyashastra

श्री राधाबल्लभ त्रिपाठी जी अनुवाद के प्रारम्भ में अपनी भूमिका के शुरू में लिखते हैं “… यह मात्र पुस्तक नहीं, एक सम्पूर्ण परंपरा का पर्याय भी है.” प्रायः साहित्य और संस्कृति से जुड़े सभी लोग इसे अपने साथ रखना चाहेंगे. पुस्तक किसी भारतीय के लिए मात्र पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है.

पुस्तक:- भरतमुनिप्रणीत नाट्यशास्त्र सम्पूर्ण हिंदी अनुवाद”

अनुवादक:- श्री राधाबल्लभ त्रिपाठी

प्रकाशक:- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली

पृष्ठ संख्या- 412, हार्ड बाउंड, मूल्य:- 500 रुपये

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(पुस्तक के समीक्षक प्रमोद कुमार झा रांची दूरदर्शन केंद्र के पूर्व निदेशक हैं और कला व साहित्य के राष्ट्रीय स्तर के मर्मज्ञ हैं।)

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