‘गाडा टोला’ संग्रह की कविताओं का आधार और कवि राही डूमरचीर की भावना ऊपर उद्धृत पंक्तियों में झलकती है. कवि महानगरों में अध्ययन और निवास के बाद उस महानगरीय संस्कृति को आत्मसात नहीं पाते हैं, उनका गाँव, उनका परिवेश उनके भीतर जीवित रहता है और अवसर मिलते ही उस परिवेश में लौट आते हैं. अपने परिवेश के प्रति कवि बहुत भावुक हैं. विकास की पूरी की पूरी अवधारणा ही प्रकृति के अस्तित्व को समाप्त कर एक काल्पनिक ‘सभ्य लोगों’ की दुनिया के निर्माण में है.
उच्च शिक्षा प्राप्त कवि राही देश के करोड़ो युवओं तरह नगरीय चका चौंध और विदेशी सभ्यता के मायाजाल से अभिभूत नहीं हैं. राही ने अपने गाँव, परिवेश और प्राकृतिक परिदृश्य को किसी बाहरी सैलानी की नज़र से नहीं देखा है, इनकी कविताएं उस गाँव के निवासी की तरह है जो मौलिक रूप से स्थायी रूप में इस भौगोलिक क्षेत्र का अंग है. ‘गंगा किनारे बसे शहर में’ कविता में कवि राही कहते हैं “गंगा किनारे बसे/इस शहर में आने से पहले/गंगा को इतने करीब से नहीं देखा था/पापनाशिनी गंगा का दुःख नहीं समझ पाया था/ कहाँ समझ पाया था /भूपेन हजारिका के गीत को भी/यहां आने के पहले गया गंगा/हमारे यहां नदियों को समा /लेने वाली एक बड़ी नदी थी/एक ऐसी नदी, जिसके किनारे से आए लोगों ने/ हमारे जंगलों-पहाड़ों में तबाही मचा दी” कवि गया गंगा के माध्यम से पूरी आधुनिक विकास यात्रा को एक अलग दृष्टिकोण से सामने रखते हैं. बार बार कवि को ऐसा लगता है कि नगरों में विकास की परिभाषा का अर्थ प्रकृति का विनाश ही है.
कविता ‘बाँसलोई का पुल ‘में भावुक कवि राही कहते हैं ” फोर लेन वाला बन गया है पुल /जिस पर झन्नाटेदार तरीके से/ गुज़रती है गाड़ियां /पहले एकमात्र पुल था /इस गाँव में /अंग्रेजों का बनाया हुआ/1924 में बना वह पुल/ अब भी दुरुस्त है/गाँव के लोग अब भी गुज़रते हैं/कभी कभार’ यहाँ “झन्नाटेदार” शब्द बहुत कुछ कह जाता है.
एक छोटी कविता देखिये: “उसके लिये कविता” ‘सबसे खूबसूरत दिनों के लिये/संभाल कर रखी थी उसने/ अपनी आंखें / हमारे लिए ‘ इस तरह की हृदय छू लेने वाली कविताएं आपको प्रायः देखने को नहीं मिली होंगी. संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कविता देखिये: ‘नोट्स/लेने के लिए/जैसे ही/मैंने लिखा/”नीची जाति”/द्विवेदी जी ने
मेरी कलम पकड़ ली/और कहा/लिखो/”नीची समझी जाने वाली जातियां”. बहुत महत्वपूर्ण बातों को इतनी सरलता और सहजता से कवि राही ही कह सकते हैं. इन महीन बातों का एक झटका सा लगता है बाद में.
कवि के इन पंक्तियों पर गौर करिए : ‘बातें होती हैं/पर हम कह नहीं पाते/डरते हैं कि ज़ुबान से/ढलक कर/कहीं खो न दे अपना नमक’. इनकी कविताओं को पढ़ते हुए कवि विनय सौरभ,अनुज लुगुन, जेसिन्ता केरकेट्टा, ग्रेस कुजूर, महादेव टोप्पो, वंदना टेटे और पूनम वासम की याद आती रही. 141पृष्ठ के इस संग्रह में 44 कविताएं हैं .पुस्तक का नाम” गाडा टोला” ही आकर्षित करता है और एक तरह से सारी कविताओं का निचोड़ है. कवि की भाषा समृद्ध है, शब्द भंडार प्रशंसनीय है, देशज शब्दों का प्रयोग भावुक करता है. संग्रह में कुछ और कविताओं को समायोजित किया जाता तो आनंददायक होता . संग्रह पठनीय, से संग्रहणीय और मित्रों को भेंट देने योग्य है.
पुस्तक: ‘गाडा टोला’
कवि:राही डूमरचीर प्रथम संस्करण:2024,
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, मूल्य: रु.199

प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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बेहतरीन पारदर्शी समीक्षा …सर 🌹🌹
यह एक सशक्त एवं अभिव्यंजक कवि की कृतियों की समर्थ समीक्षा है
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