हाइब्रिड युद्ध के दौर में संस्कृति और विरासत राष्ट्रीय सुरक्षा के अभिन्न अंग : राज्यपाल ले.ज. एस.अता हसनैन

बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने कहा है कि युद्ध अब परुंपरागत ढंग से नहीं लड़े जा रहे हैं और समकालीन हाइब्रिड युद्ध के दौर में संस्कृति और विरासत को संरक्षित रखना भी बड़ा उद्देश्य बन गया है। सैयद अता हसनैन मंगलवार को नई दिल्ली में इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आई.जी. एन. सी ए.) के कला निधि डिवीजन द्वारा मेजर (सेवानिवृत्त) सरस त्रिपाठी द्वारा लिखित पुस्तक ‘गार्डियन्स ऑफ ग्लोरी: हेरिटेज एंड द आर्म्ड फोर्सेज इन कश्मीर’ के लोकार्पण के बाद उपस्थित लोगों को संबोधित कर रहे थे।

Written By : डेस्क | Updated on: July 29, 2026 11:57 pm

लोकार्पण केंद्र के समवेत ऑडिटोरियम में किया गया। लोकार्पण केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में फैकल्टी ऑफ आर्ट्स एंड डिज़ाइन के डीन और आईजीएनसीए के पूर्व डीन (एडमिनिस्ट्रेशन) प्रो. रमेश सी. गौर तथा डॉ. बी. आर. अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में एसएचआरएम के प्रोफेसर आनंद वर्धन की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। स्वागत एवं प्रारम्भिक उद्बोधन प्रो. के. अनिल कुमार, एचओडी, कला निधि डिवीजन द्वारा दिया गया।  वक्ताओं ने भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा राष्ट्रीय सुरक्षा, सभ्यतागत निरन्तरता और सशस्त्र बलों के साथ उसके संबंध की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए।

पुस्तक लोकार्पण के अवसर पर लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) ने समकालीन हाइब्रिड युद्ध के परिप्रेक्ष्य में संस्कृति और विरासत के बढ़ते महत्व पर बल दिया। कश्मीर में अपने सैन्य अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक संघर्ष केवल पारम्परिक सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि पहचान, स्मृति और सभ्यतागत विरासत तक विस्तृत हो चुके हैं। ऐसे में सांस्कृतिक परम्पराओं और ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न अंग बन जाता है। कश्मीरी पण्डित समुदाय के विस्थापन का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे एक सभ्यतागत विरासत को मिटाने का प्रयास बताया तथा उसके प्रलेखन, अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा तथा शारदा पीठ परम्परा के पुनर्जीवन जैसे प्रयासों को कश्मीर की बहुलतावादी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के तौर पर निरूपित किया।

उन्होंने कहा कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में कार्यरत सैन्य अधिकारियों के लिए स्थानीय इतिहास, संस्कृति और धार्मिक परम्पराओं की समझ अत्यन्त आवश्यक है तथा सांस्कृतिक संवेदनशीलता आधुनिक सैन्य तैयारी का अनिवार्य अंग है। राज्यपाल ने मेजर सरस त्रिपाठी (सेवानिवृत्त) के शोध की सराहना करते हुए उन्होंने इस प्रकाशन को विरासत और राष्ट्रीय सुरक्षा के विमर्श में एक महत्त्वपूर्ण योगदान बताया तथा आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक सैन्य संस्थानों में स्थान पाएगी और भावी सैन्य अधिकारियों को भारत की सांस्कृतिक विरासत को एक रणनीतिक राष्ट्रीय धरोहर के रूप में समझने में सहायक होगी।

रामबहादुर राय ने कहा कि यह ऐसी पुस्तक है जिसे कश्मीर में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को गंभीरता से पढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि यद्यपि इस पुस्तक को कुछ ही घंटों में पढ़ा जा सकता है, किन्तु इसे पढ़ने के उपरान्त पाठकों में कश्मीर के इतिहास और सभ्यता को और गहराई से जानने की जिज्ञासा अवश्य उत्पन्न होगी। उन्होंने कहा कि व्यापक शोध तथा लेखक के सैनिक अनुभवों पर आधारित यह पुस्तक कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत तथा उसके पवित्र स्थलों और परम्पराओं के संरक्षण में भारतीय सेना की भूमिका का विस्तृत दस्तावेज प्रस्तुत करती है। श्री राय ने कहा कि यह पुस्तक जम्मू-कश्मीर के ऐतिहासिक विकास का संतुलित विवेचन करते हुए आतंकवाद से उत्पन्न चुनौतियों तथा ऑपरेशन सद्भावना, अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण जैसे प्रयासों के माध्यम से क्षेत्र की विरासत के संरक्षण में सशस्त्र बलों की भूमिका को रेखांकित करती है। लेखक द्वारा विरासत संरक्षण से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों तथा विधिक ढाँचे को सुदृढ़ बनाने संबंधी सुझावों की भी उन्होंने सराहना की और आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक नीति निर्माताओं तक पहुँचेगी तथा विरासत संरक्षण पर राष्ट्रीय विमर्श को समृद्ध करेगी।

प्रो. रमेश सी. गौ़ड़ ने इस पुस्तक को भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में निभाई गई भूमिका के प्रलेखन पर आधारित चार वर्षों से अधिक के गहन शोध का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण वैश्विक चिंता का विषय है तथा इस संदर्भ में आई.जी. एन. सी ए. शोध, संरक्षण और डिजिटल प्रलेखन के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए निरन्तर कार्यरत है। सांस्कृतिक संपदा की सुरक्षा से संबंधित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विधिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रलेखन और संस्थागत सहयोग के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रकाशन स्मारकों, पवित्र स्थलों और सांस्कृतिक परम्पराओं के संरक्षण में सशस्त्र बलों की अपेक्षाकृत कम चर्चित भूमिका को रेखांकित करता है तथा कश्मीर की ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि का समग्र परिचय भी प्रस्तुत करता है। मेजर (सेवानिवृत्त) सरस त्रिपाठी को बधाई देते हुए उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक विरासत संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा के विमर्श को सुदृढ़ करेगी तथा भारत की सभ्यतागत विरासत के संरक्षण में सशस्त्र बलों के योगदान को उचित पहचान दिलाएगी।

पुस्तक के लेखक मेजर (सेवानिवृत्त) सरस त्रिपाठी ने कहा कि यह प्रकाशन आई. जी. एन. सी ए. की एक शोध परियोजना से विकसित हुआ है, जिसमें कश्मीर के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन पर आतंकवाद के प्रभाव तथा विरासत स्थलों के संरक्षण में सशस्त्र बलों की भूमिका का अध्ययन किया गया। उन्होंने बताया कि बाद में इस अध्ययन का दायरा भारत तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से संबंधित विधिक प्रावधानों को भी सम्मिलित करते हुए विस्तारित किया गया। कश्मीर की सभ्यतागत महत्ता तथा उसकी मूर्त एवं अमूर्त सांस्कृतिक विरासत पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि यह पुस्तक व्यापक क्षेत्रीय अध्ययन और प्रलेखन पर आधारित कश्मीर की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत का एक समग्र परिचय प्रस्तुत करती है। श्री त्रिपाठी ने आशा व्यक्त की कि यह प्रकाशन संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में विरासत संरक्षण के प्रति व्यापक जागरूकता और संवेदनशीलता विकसित करने में सहायक सिद्ध होगा।

प्रो. आनंद वर्धन ने इस प्रकाशन को कश्मीर की सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासत को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान बताया। उन्होंने लेखक सरस त्रिपाठी के शोध की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक कश्मीर की आध्यात्मिक परम्पराओं को रेखांकित करने के साथ साथ उसकी मूर्त एवं अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भारतीय सशस्त्र बलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका का प्रभावी दस्तावेज प्रस्तुत करती है।

आयोजन के प्रारम्भ में अपने स्वागत एवं प्रारम्भिक उद्बोधन में प्रो. के. अनिल कुमार ने कहा कि यह प्रकाशन विशेष रूप से संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में सांस्कृतिक विरासत के प्रलेखन और संरक्षण के प्रति आई.जी. एन. सी ए. की प्रतिबद्धता का परिचायक है। उन्होंने कहा कि इस शोध का उद्देश्य कश्मीर की सभ्यतागत विरासत के संरक्षण में भारतीय सशस्त्र बलों की अपेक्षाकृत कम किंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका को सामने लाना है। कार्यक्रम में देशभर से आए प्रतिष्ठित विद्वानों, शिक्षाविदों, सशस्त्र बलों के सदस्यों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा विरासत संरक्षण से जुड़े अनेक विशेषज्ञों एवं संस्कृति प्रेमियों ने सहभागिता की।

ये भी पढ़ें :-सभी परम्पराओं की चिंता ही सांस्कृतिक बहुलता की रक्षा है : प्रो. आशीष त्रिपाठी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *