पठनीय और संग्रहणीय हैं डॉ. भावना के ‘चुने हुए शेर’

किसी कवयित्री की कई किताबें जब पाठकों के सामने से गुजर चुकी होती है तो कवयित्री को अपनी पहचान बनाने की ज़रूरत नहीं होती.  उसमें भी कवयित्री ने हिंदी में ग़ज़ल को ही विधा के रूप में चुना हो तो कुछ सोच कर ही चुना होगा ! दुष्यंत कुमार से लेकर अबतक बहुत सारे कवि कवयित्रियों ने हिंदी ग़ज़ल को इतना समृद्ध कर दिया है कि हिंदी काव्य रचना के क्षेत्र में भी ग़ज़ल एक विधा के रूप में आम स्वीकृति पा चुकी है.

पुस्तक के आवरण पृष्ठ का अंश
Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: July 23, 2026 1:08 am

इस श्रृंखला में अब भावना का नाम भी लिया जाने लगा है! पेशे से रसायन शास्त्र की सहायक प्राध्यापक डॉ. भावना ने पहले कविता और फिर ग़ज़ल लिखना कब शुरू किया इन्हें शायद याद भी नहीं होगा. स्कूल के दिनों से से कविता लिखती रहीं. हिंदी कवयित्री मां के घर भी साहित्यिक माहौल बना रहता था. इनकी मां के गोष्ठियों शामिल होने वालों को स्वरचित अपनी नई कविता सुनाना आवश्यक होता था.

बालमन में कवयित्री बनने का बीज प्रायः तभी पड़ गया होगा. “चुने हुए शेर” डॉ भावना के अबतक लिखे गए ग़ज़लों में से चुनकर ली गई रचनाएं हैं . ग़ज़लों का चयन और संपादन किया है हिंदी ग़ज़ल का एक चर्चित नाम हरेराम समीप जी ने. हरेराम जी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि ‘ ……डॉ भावना की ग़ज़लिंक इन शेरों से गुजरते हुए भी बार – बार यही महसूस होता रहा है कि उनकी ग़ज़लें जीवन को नजदीक से देखने का सुंदर उपक्रम है।

सबसे पहले उनके लेखकीय सरोकारों को स्पष्ट करते हुए उनके इस शेर से बात शुरू करते हैं… फूल – पत्ती पर अब तक लिखा है बहुत/आदमी हैं तो हम आदमी पर लिखें। यह ‘लिखना ‘ एक कवि के लिए कितना कठिन है वे इसकी ओर भी संकेत करती हैं:… इक बक्से में खूब जमा कर रख भी लूं मैं/दुख की लंबी-चौड़ी चादर रहना मुश्किल है..’ अपनी भूमिका में हरेराम जी ने कई पृष्ठों में विस्तार से इनकी ग़ज़लों पर प्रकाश डाला है.

एक सौ दो पृष्ठों के इस संग्रह की ग़ज़लों के संग्रहण में हरेराम जी ने बहुत परिश्रम कर गागर में सागर भरने जैसा काम किया है. 102 पृष्ठ के इस गज़ल संग्रह में 83गजल संगृहीत हैं. मुखपृष्ठ आकर्षक है. छपाई सुंदर और उत्कृष्ट कागज पर की गई है.गजल लेखिका की भाषा प्रांजल है और इन्हें तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का उचित ज्ञान भी है और प्रयोग भी सही सही जानती हैं. संकलकर्ता इस पुस्तक में कुछ और भी ग़ज़ल शामिल कर लेते तो क्या ही अच्छा होता. कवयित्री भी प्रायः कुछ ग़ज़लों के और शामिल करने का आग्रह करने से परहेज किया ! संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है।

पुस्तक: चुने हुए शेर, कवयित्री: डॉ भावना, संपादन : हरेराम समीप, पृष्ठ:102

प्रकाशक: लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली, मूल्य: रु 200

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)

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