बहुचर्चित काव्य-कृति ‘जीवन है तो’ की रचनाकार हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री डा सविता मिश्र ‘मागधी’ नहीं रहीं । ६० वर्ष की आयु में उन्होंने बुधवार की संध्या राजधानी के एक निजी अस्पताल में अपना शरीर छोड़ दिया। ‘निमोनिया’ की शिकायत पर उन्हें गत रविवार को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ‘कर्क’ रोग को पराजित कर चुकी सविता जी फेफड़े के संक्रमण से पराजित हो गयीं। उनके निधन से साहित्य जगत में गहरा संताप व्याप्त है।
डा मागधी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा है कि जीवन के प्रति सकारात्मक राग रखने वाली सविता जी काव्य-प्रतिभा से संपन्न अत्यंत गम्भीर और विदुषी कवयित्री थीं। उनके निधन के ठीक एक माह पूर्व १४ अप्रैल को, उनकी अत्यंत लोकप्रिय हुई काव्य-कृति ‘जीवन है तो’ का साहित्य सम्मेलन में लोकार्पण हुआ था। उनके निधन से काव्य-साहित्य को व्यापक क्षति पहुँची है।
शोक व्यक्त करने वालों में सम्मेलन के प्रधान मंत्री डा शिववंश पाण्डेय, साहित्यमंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी, डा रत्नेश्वर सिंह, आरपी घायल, डा मधु वर्मा, डा कल्याणी कुसुम सिंह, डा पुष्पा जमुआर, आचार्य विजय गुंजन, सुनील कुमार दूबे, डा पूनम आनन्द, डा विभारानी श्रीवास्तव, शमा कौसर ‘शमा’ प्रो सुशील झा, सिद्धेश्वर, डा मीना कुमारी परिहार, सागरिका राय, डा ओम् प्रकाश जमुआर, डा अर्चना त्रिपाठी, उत्तरा सिंह, संगीता मिश्र, डा सुधा सिन्हा, डा मनोज गोवर्द्धनपुरी, डा ओम् प्रकाश पाण्डेय, डा सीमा रानी, डा रमेश पाठक, डा ध्रुव कुमार, नम्रता मिश्रा, डा माला सिन्हा, डा रमाकान्त पाण्डेय, डा ऋचा वर्मा, डा सीमा रानी, वीरेंद्र कुमार भारद्वाज, डा प्रतिभा सहाय, मीरा प्रकाश, रौली कुमारी, राज किशोर राजन, लता प्रासर, राम नाथ राजेश, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, प्रवीर पंकज, डा विनोद शर्मा आदि के नाम सम्मिलित हैं।
गुरुवार के दूसरे पहर गंगा के तट पर दीघा घाट पर डा सविता मिश्र का अग्नि-संस्कार संपन्न हुआ। उनके कनिष्ठ पुत्र अमन ने मुखाग्नि दी। शोक की इस घड़ी में उनका ज्येष्ठ पुत्र मयंक और पुत्रवधू अपराजिता सहित अनेक परिजन उपस्थित थे।
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