इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने आईजीएनसीए प्रतिनिधिमंडल को संबोधित करते हुए ‘युगे युगीन भारत संग्रहालय’ का उल्लेख किया और कहा कि जो स्थान पहले सत्ता का केंद्र था, वह अब संस्कृति का केंद्र बन गया है। उन्होंने यह भी दोहराया कि पहले नॉर्थ और साउथ ब्लॉक सत्ता के प्रतीक माने जाते थे, लेकिन अब यह स्थिति बदल चुकी है।
प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि इतिहास-बोध होना अत्यंत आवश्यक है और इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र जैसे सांस्कृतिक संस्थानों ने लोगों में इस इतिहास-बोध को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘स्व’ की भावना के साथ भारत को समझना बेहद आवश्यक है।
इस प्रतिनिधिमंडल में डॉ. सोनल मानसिंह (पूर्व सांसद), डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम, श्री प्रसून जोशी, श्री हर्षवर्धन नेओटिया, डॉ. भारत गुप्त, डॉ. संध्या पुरेचा, श्री देवेंद्र शर्मा, सुश्री रति विनय झा, प्रो. निर्मला शर्मा, श्री बिरद याज्ञिक, प्रो. कुलदीप अग्निहोत्री और सुश्री वंदना जैन शामिल थे।
इस अवसर पर राम बहादुर राय ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में, जब से उन्होंने आईजीएनसीए के अध्यक्ष का दायित्व संभाला है, यह संस्थान एक अभिजात (ईलीट) संस्था से आगे बढ़कर हर भारतीय का संस्थान बन गया है और देश के लोगों के लिए एक लोकतांत्रिक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ है। अन्य ट्रस्टियों ने भी इस विचार से सहमति जताई और पिछले दशक को सांस्कृतिक नवजागरण का काल बताया।
इसके बाद, आईजीएनसीए के स्थापना दिवस समारोह 2026 के अंतर्गत कलाकोश प्रभाग द्वारा बेहद महत्त्वपूर्ण पुस्तक शृंखला ‘कलातत्त्वकोश’ के आठवें के लोकार्पण एवं विमर्श का कार्यक्रम संपन्न हुआ। इसका लोकार्पण कलाकोश प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. सुधीर लाल, भारतीय विद्या प्रयोजना के प्रमुख प्रो. आर्य भूषण शुक्ला, प्रो. मारुति नंदन तिवारी, प्रो. रजनीश कुमार मिश्रा और प्रो. ओमनाथ विमली ने किया। वक्ताओं ने अपने संबोधन में भारतीय कला की मूलभूत अवधारणाओं को समझने में ‘कलातत्त्वकोश’ की महत्ता को रेखांकित करते हुए इसे भारतीय ज्ञान परम्परा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया। इस कार्यक्रम में जिसमें विद्वानों, शोधार्थियों एवं कला-प्रेमियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही। कार्यक्रम के प्रारम्भ में कलाकोश प्रभाग के प्रमुख प्रो. सुधीर लाल ने स्वागत एवं परिचय भाषण दिया और ‘कलातत्त्वकोश’ परियोजना की पृष्ठभूमि, उद्देश्यों और इस खंड की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों एवं प्रतिभागियों ने इस प्रकाशन को भारतीय कला अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया और आईजीएनसीए के इस प्रयास की सराहना की।
इस अवसर पर आयोजित विशेष प्रदर्शनियों में फोटोग्राफिक प्रदर्शनी “कलादृष्टि : ए डिकेड ऑफ विजन” (कलादृष्टि : एक दशक की गौरवपूर्ण यात्रा) विशेष आकर्षण का केंद्र रही। इस प्रदर्शनी में 2016 से 2026 तक आईजीएनसीए की एक दशक की समृद्ध यात्रा की झलक फोटोग्राफ्स के माध्यम से पेश की गई है। अन्य प्रदर्शनियों में ‘ब्रीदिंग हाइड्स – द सोल ऑफ आंध्र पपेट्री’ शामिल है, जो आंध्र प्रदेश की पारम्परिक चमड़ा कठपुतली कला पर आधारित आख्यान प्रदर्शनी है। इसके अलावा, राजस्थान की थेवा कला पर केंद्रित प्रदर्शनी भी शामिल है। ये प्रदर्शनियां दर्शकों को भारत की दुर्लभ और जीवंत कलात्मक परम्पराओं से परिचित कराएंगी।
ग़ौरतलब है कि केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालयसंस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) का 39वां स्थापना 19 से 21 मार्च 2026 तक आयोजित हो रहा है। स्थापना दिवस समारोह भारतीय कला, संस्कृति और परम्पराओं का एक भव्य उत्सव है। आईजीएनसीए इस अवसर पर शास्त्रीय नृत्य, लोक कलाओं, पारम्परिक विधाओं तथा विशेष प्रदर्शनियों के माध्यम से भारत की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत को एक मंच पर प्रस्तुत कर रहा है।
पहले दिन, 19 मार्च को शाम 7 बजे प्रख्यात नृत्यांगना, सांस्कृतिक विदुषी एवं पूर्व राज्यसभा सांसद ‘पद्म विभूषण’ डॉ. सोनल मान सिंह ने “नाट्य कथा – देवी” की प्रस्तुति से दर्शकों को अभिभूत कर दिया।
दूसरे दिन 20 मार्च को सायं 7 बजे विख्यात सांस्कृतिक चिंतक भरतनाट्यम कलाकार एवं ‘पद्म विभूषण’ डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम “भगवद गीता” पर आधारित विशेष नृत्य-नाट्य प्रस्तुति देंगी, जिसमें गीता के दार्शनिक संदेशों को नृत्य और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से सजीव किया जाएगा।
समारोह का तीसरा दिन 21 मार्च भारत की विविध लोक परम्पराओं और मार्शल आर्ट्स को समर्पित रहेगा। कार्यक्रम की शुरुआत सायं 4 बजे असम के बागुरुम्बा नृत्य से होगी। इसके बाद हिमाचल प्रदेश का नाटी नृत्य, गुजरात का तलवार रास, केरल का प्राचीन मार्शल आर्ट कलारीपयट्टु, मध्य प्रदेश की कबीर गायन परम्परा तथा अंत में सूफी एवं कबीर गायन की आकर्षक प्रस्तुतियां होंगी।
यह स्थापना दिवस समारोह भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के प्रति आईजीएनसीए की सतत प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह मंच विभिन्न कला रूपों के बीच संवाद स्थापित करते हुए परम्परा और आधुनिकता के समन्वय को भी रेखांकित करता है।
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