‘आवाज़ों के जुगनू’ हमारे सांस्कृतिक डीएनए का दस्तावेज़ है : हरीश भिमानी

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के मीडिया सेंटर द्वारा ‘आवाज़ों के जुगनू : द वॉइस मास्टर्स ऑफ़ इंडिया’ पुस्तक का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। यह आयोजन नई दिल्ली में आईजीएनसीए के समवेत सभागार में आयोजित किया गया। इस अवसर पर एक क्यूआर कोड भी रिलीज किया गया, जिसे स्कैन कर पुस्तक में शामिल सभी हस्तियों के इंटरव्यू सुने जा सकते हैं।

आवाज़ों के जुगनू का लोकार्पण करते अनुराग पुनेठा, सोनल कौशल, शम्मी नारंग, हरीश भिमानी, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, डॉ. शेफाली चतुर्वेदी
Written By : डेस्क | Updated on: January 9, 2026 9:55 pm

आवाज़ों के जुगनू’ लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानन्द जोशी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ ब्रॉडकास्टर एवं वॉयस एक्टर हरीश भिमानी उपस्थित रहे। वहीं विशिष्ट अतिथि थे वरिष्ठ ब्रॉडकास्टर, दूरदर्शन के पूर्व समाचारवाचक और वॉयस एक्टर शम्मी नारंग, जबकि विशेष अतिथि थीं सुप्रसिद्ध वॉयस एक्टर सोनल कौशल, जिन्होंने ‘डोरेमॉन’ और ‘छोटा भीम’ जैसे एनिमेशन कैरेक्टर को आवाज़ दी है। इस अवसर पर पुस्तक की संयोजन और संकलनकर्ता डॉ. शेफाली चतुर्वेदी भी उपस्थित थीं। आईजीएनसीए के मीडिया सेंटर के नियंत्रक श्री अनुराग पुनेठा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि कला का दायरा बहुत विस्तृत होता है, इसलिए आईजीएनसीए ने एक साहसिक पहल करते हुए एक गैर-परम्परागत कला यानी आवाज़ों की दुनिया से जुड़े कलाकारों की यात्रा का दस्तावेज़ीकरण ‘आवाज़ों के जुगनू’ पुस्तक और ऑडियो के रूप में करने की कोशिश की है। उन्होंने इस पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण भी लाने की घोषणा की और कहा कि ये तो शुरुआत है, इस पहल को और आगे बढ़ाया जाएगा।

महाभारत में ‘समय’ को आवाज़ देने वाले हरीश भिमानी ने कहा कि आवाज़ केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और संवेदना की वाहक होती है। उन्होंने कहा, क्या अहमियत है आवाज की। हमारी जिंदगी में क्या महत्व है स्वर का। संस्कृत का एक सुभाषित है, जिसका अर्थ है कि कोयल भी काली होती है और कौआ भी काला होता है, तो दोनों में फर्क क्या है। दोनों में फर्क आवाज़ का होता है। उन्होंने कहा, ‘आवाज़ों के जुगनू’ एक शानदार पहल है और अगर इसका मैं इसका एक नगण्य हिस्सा बन पाया हूं, तो मैं इसे विनम्रता से स्वीकार करता हूं। यह पुस्तक केवल अक्षरों का संग्रह नहीं है, बल्कि उस अदृश्य प्राण तत्व को पकड़ने का प्रयास है, जो सदियों से हमारी सामूहिक स्मृति का हिस्सा है। ‘आवाज़ों के जुगनू’ हमारे सांस्कृतिक डीएनए का दस्तावेज़ है। यह हमें याद दिलाता है कि जब शब्द मौन हो जाते हैं, तब भी उसके स्वर शिल्प में सभ्यता की गूंज जीवित रहती है।

दिल्ली मेट्रो की आवाज़ शम्मी नारंग ने भारतीय प्रसारण जगत में वॉयस आर्टिस्ट की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार के दस्तावेज़ी प्रयासों की प्रशंसा की। उन्होंने अपनी यात्रा को साझा करते हुए बताया कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद कैसे वो आवाज़ की दुनिया में आ गए। उन्होंने उच्चारण और लहजे को ठीक रखने पर ज़ोर देते हुए कहा कि अच्छा बोलिए, क्योकि अच्छा बोलने का कोई बिल नहीं आता। अगर आप अच्छे से बोलेंगे, तो सामने वाले पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। वहीं, सोनल कौशल ने नई पीढ़ी के लिए वॉयस इंडस्ट्री में संभावनाओं और चुनौतियों पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने अपनी यात्रा के बारे में विस्तार से बात की और सभागार में उपस्थित बच्चों को डोरेमॉन और छोटा भीम के सम्वाद बोलकर सुनाए, जिससे सभागार तालियों से गूंज उठा। अनुराग पुनेठा ने अपने स्वागत भाषण में बताया कि आवाज़ें भरोसा पैदा करती हैं। इसका एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक बार द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अमेरिका में एक नाटक के प्रसारण में कलाकार ने कहा कि अमेरिका पर मंगल ग्रह से हमला हो गया है और अमेरिका के लोगों ने इस वाक्य पर पर भरोसा कर लिया और सड़कों पर इकट्ठा हो गए। तो, ये होती है आवाज़ की ताक़त।

पुस्तक का परिचय देते हुए इसकी संयोजक एवं संकलनकर्ता डॉ. शेफाली चतुर्वेदी ने बताया कि ‘आवाज़ों के जुगनू’ भारतीय वॉयस इंडस्ट्री की उन विशिष्ट और यादगार आवाज़ों का दस्तावेज़ है, जिन्होंने रेडियो, दूरदर्शन, विज्ञापन, डबिंग, उद्घोषणा और मंचीय कविता के माध्यम से भारतीय ब्रॉडकास्टिंग और आवाज़ों की दुनिया को समृद्ध किया है। पुस्तक में इन कलाकारों की जीवन-यात्रा, रचनात्मक संघर्ष और योगदान को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
अंत में, श्री अनुराग पुनेठा ने अतिथियों और आगंतुकों को धन्यवाद देते हुए ‘आवाज़ों के जुगनू’ के सिलसिले को और आगे ले जाने की बात कही।

कार्यक्रम में प्रसिद्ध रेडियो जॉकी (आरजे) नितिन ख़ुराफ़ाती, सिमरन, जसलीन भल्ला, सायमा रहमान, प्रसिद्ध ब्रॉडकास्टर राजेंद्र चुघ, राजीव कुमार शुक्ल, रिनी खन्ना, रमा पांडे, श्रीवर्धन त्रिवेदी, नरेंद्र जोशी भी उपस्थित थे। सिमरन, राजेंद्र चुघ, राजीव कुमार शुक्ल और नरेंद्र जोशी ने भी इस अवसर पर अपने विचार साझा किया। इनके अलावा कला, मीडिया और संस्कृति से जुड़े अनेक विद्वानों, कलाकारों, विद्यार्थियों और श्रोताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। अपनी तरह के इस अनूठे कार्यक्रम ने भारतीय वॉयस इंडस्ट्री के प्रति नई समझ और संवेदना को और गहराई प्रदान की।

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