Foreign Contribution (Regulation Act), 2010 विदेश से मिलने वाले चंदे और विदेशी आतिथ्य को नियंत्रित करता है। विदेशी धन प्राप्त करने वाले NGOs और अन्य संगठनों के लिए FCRA के तहत पंजीकरण जरूरी है। कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल गतिविधियों में न हो।
सरकार क्या बदलना चाहती है?
2026 का संशोधन विधेयक खास तौर पर उन संस्थाओं की विदेशी धन से बनी संपत्तियों के प्रबंधन की व्यवस्था करता है जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो गया है, संस्था ने पंजीकरण सरेंडर कर दिया है या उसका नवीनीकरण नहीं हुआ है। इसके लिए एक Designated Authority बनाने का प्रस्ताव है, जिसके पास ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटारे की शक्तियां होंगी।
विपक्ष का विरोध क्यों?
विपक्ष का तर्क है कि इन प्रावधानों से सरकार को NGOs, सामाजिक संस्थाओं और अल्पसंख्यक संस्थानों की संपत्तियों पर व्यापक अधिकार मिल सकते हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने विधेयक को वापस लेने की मांग की है और व्यापक हितधारक परामर्श की जरूरत बताई है।
सरकार का जवाब
सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। उसका कहना है कि विधेयक किसी धर्म या समुदाय को निशाना नहीं बनाता, बल्कि विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकने और ऐसी संस्थाओं की संपत्तियों के संबंध में स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाने के लिए है। अब विधेयक पर अंतिम फैसला JPC की जांच और रिपोर्ट के बाद होगा।
मानसून सत्र के आखिरी दिन से पहले FCRA विधेयक का JPC में जाना इसलिए महत्वपूर्ण है कि सरकार इसे फिलहाल पारित कराने के बजाय संसदीय जांच के लिए भेजने पर सहमत हुई है।
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