आईजीएनसीए में समारोह का तीसरा एवं समापन दिवस (21 मार्च) लोक संगीत के विविध रंगों से सराबोर रहा। समापन दिवस पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की शुरुआत अपराह्न 4 बजे असम के बागुरुम्बा नृत्य से हुई, जिसे सुश्री स्वगता सरमा एवं संस्कृति समूह ने प्रस्तुत किया। इसके बाद, 4.30 बजे हिमाचल प्रदेश का पारम्परिक नटी नृत्य प्रेम चंद बाउनाली और उनके दल द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें पहाड़ी संस्कृति की सहजता और उल्लास झलक उठा।
शाम 5 बजे गुजरात का प्रसिद्ध तलवार रास, निलेश परमार एवं समूह द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसने वीरता और सामूहिकता का अद्भुत प्रदर्शन किया। इसके बाद 5.30 बजे केरल की प्राचीन मार्शल आर्ट ‘कलारिपयट्टु’ का रोमांचक प्रदर्शन कृष्णदास गुरुक्कल एवं वल्लभट्टा कलारी समूह द्वारा किया गया, जिसने दर्शकों को आश्चर्यचकित कर दिया।
संध्या के कार्यक्रमों में 6 बजे पद्मश्री भेरू सिंह चौहान (मध्य प्रदेश) ने ‘मन लागो मेरो यार फकीरी में’ आदि कबीर के भजन सुनाकर कर श्रोताओं को एक अलग ही दुनिया में पहुंचा दिया। उनके गायन में संत कबीर की वाणी का गूढ़ आध्यात्मिक भाव मुखर हुआ।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की आखिरी कड़ी के रूप में, प्रसिद्ध सूफी गायिका डॉ. ममता जोशी ने सूफी एवं कबीर गायन की प्रस्तुति दी, जिसने पूरे वातावरण को भक्ति और सूफियाना रंग में रंग दिया।
ग़ौरतलब है कि समारोह के पहले दो दिन शास्त्रीय कला की उत्कृष्ट प्रस्तुतियों को समर्पित रहे। पहले दिन प्रख्यात नृत्यांगना, सांस्कृतिक विदुषी एवं पूर्व राज्यसभा सांसद ‘पद्म विभूषण’ डॉ. सोनल मान सिंह ने “नाट्य कथा – देवी” की प्रस्तुति से दर्शकों को अभिभूत कर दिया। उनकी सशक्त अभिव्यक्ति और गहन शास्त्रीयता ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं, दूसरे दिन डॉ. पद्मा सुब्रमण्यम द्वारा प्रस्तुत ‘भगवद्गीता’ पर आधारित नृत्य-नाट्य रचना केवल एक कलात्मक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा थी, जहां नृत्य, संगीत और दर्शन एकाकार होकर दर्शकों को भीतर तक स्पर्श कर रहे थे। 83 वर्ष की आयु में लगभग दो घंटे तक निरंतर प्रस्तुति देना अपने आप में अद्वितीय था, परंतु उससे भी अधिक चमत्कृत करने वाली थी उनकी अभिव्यक्ति की जीवंतता और ऊर्जा। उनके मुख की भाव-भंगिमाएं इतनी सजीव थीं कि गीता के प्रत्येक श्लोक का भाव मानो साकार हो उठता था।
समारोह के दौरान केन्द्र परिसर में आयोजित प्रदर्शनियों ने भी विशेष आकर्षण का केंद्र बनाया। फोटोग्राफिक प्रदर्शनी ‘कलादृष्टि : ए डिकेड ऑफ विज़न’ (‘कलादृष्टि : एक दशक की गौरवशाली यात्रा’) ने आईजीएनसीए की रचनात्मक यात्रा को प्रस्तुत किया। ‘आख्यान: ब्रीदिंग हाइड्स – द सोल ऑफ आंध्र पपेट्री’ में आंध्र प्रदेश की पारम्परिक कठपुतली कला का जीवंत चित्रण देखने को मिला, वहीं ‘थेवा प्रदर्शनी’ ने राजस्थान की एक विशिष्ट एवं कम परिचित कला शैली थेवा को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।
यह त्रिदिवसीय आयोजन शास्त्र और लोक के अद्वितीय संगम के रूप में सामने आया, जहां एक ओर शास्त्रीय प्रस्तुतियों ने भारतीय परम्परा की गहराई और दार्शनिकता को अभिव्यक्त किया, वहीं लोक कलाओं ने जनजीवन की सहजता, उल्लास और विविधता को उजागर किया। आईजीएनसीए का यह स्थापना दिवस समारोह न केवल कला प्रेमियों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव रहा, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रसार के प्रति केन्द्र की निरंतर प्रतिबद्धता का भी सशक्त प्रमाण बना।
ये भी पढ़ें :-आईजीएनसीए का 39वां स्थापना दिवस : 19–21 मार्च तक संस्कृति का भव्य उत्सव