वर्षा ऋतु के आगमन के साथ इस उत्सव में जीवंत परंपराओं और कलात्मक अभिव्यक्तियों के माध्यम से रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए, जिनमें प्रदर्शनी, लोक नृत्य और पारंपरिक बाज़ार प्रमुख रहे, जो विशेष रूप से पंजाब की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को उजागर करते हैं। तीज बाज़ार में एक तरफ विभिन्न हस्तशिल्प, पारंपरिक परिधान और अन्य उपयोग वाली कलात्मक वस्तुओं की विविध रेंज प्रस्तुत की गई, तो परिचर्चा में राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुश्री डेलीना खोंगदुप और अन्य वक्ताओं ने परिवार में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर विशेष तीज बाज़ार का आयोजन किया गया। वहां हस्तशिल्प और पारंपरिक परिधानों की विविध रेंज आकर्षण के केंद्र में थीं। पंजाब से लेकर आंध्र प्रदेश तक देश के विभिन्न हिस्सों की देशी उपज, हस्तनिर्मित शिल्प और जैविक उत्पादों को प्रदर्शित करने वाले स्टॉल लगे थे। आईजीएनसीए की महिला कर्मचारियों के लिए मेहंदी (हेना) स्टॉल भी विशेष रूप से लगाया गया। यह आयोजन क्षेत्रीय परंपराओं के पुनर्जीवन और उनके प्रचार-प्रसार की दिशा में एक सशक्त प्रयास था। ‘फुलकारी: पंजाब के रंग’ नामक प्रदर्शनी और ‘पंजाब के लोक नृत्य’ नामक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन के विशेष आकर्षण रहे।
आयोजन के परिचर्चा वाले हिस्से में इस अवसर पर राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुश्री डेलीना खोंगदुप मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। दिल्ली विश्वविद्यालय में मानव विज्ञान विभाग की प्रोफेसर प्रो. सुभद्रा मित्र चन्ना विशिष्ट अतिथि थीं। शिक्षाविद्, कथावाचक और लेखिका श्रीमती मालविका जोशी, समारोह की विशिष्ट अतिथि रहीं। आइजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिवदानंद जोशी ने अध्यक्षता की, जबकि कार्यक्रम की शुरुआत जनपद संपदा प्रभाग, आईजीएनसीए के प्रमुख प्रो. के. अनिल कुमार के स्वागत भाषण से हुई। डॉ. रेमबेमो ओद्युओ ने प्रभाग की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें प्रभाग की गतिविधि और उपलब्धियों का विस्तृत विवरण दिया गया।
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. सच्चि दानंद जोशी ने कहा कि हरियाली तीज पारिवारिक एकता का प्रतीक है। उन्होंने इस त्योहार से जुड़ी कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु 108 व्रत किए, जो पारिवारिक जीवन में समर्पण और साथ के गहरे महत्व को दर्शाता है। आज के समय में, जब पारिवारिक रिश्ते टूटन की ओर बढ़ रहे हैं, ऐसे त्योहार हमें भावनात्मक और सामाजिक रूप से जोड़े रखते हैं। डॉ. जोशी ने आगे कहा कि परिवार और पर्यावरण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं और तीज जैसे उत्सव इन संबंधों में हमें जड़ से जोड़े रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आईजीएनसीए में एक-एक प्रभाग उस स्तर पर काम करता है, जितना कई संस्थाएं समग्र रूप में भी नहीं कर पातीं—जो केंद्र की सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टि को दर्शाता है।
प्रो. सुभद्रा मित्र चन्ना ने तीज के गहरे दार्शनिक और सामाजिक अर्थों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह उत्सव प्रायः अकादमिक जगत में उपेक्षित रहा है, जबकि इसमें गहन प्रतीकात्मक मूल्य निहित हैं। उन्होंने बताया कि यह पर्व भगवान शिव और पार्वती के प्रतीकात्मक विवाह का उत्सव है, जो पुरुष (स्थिर, नियंत्रक ऊर्जा) और प्रकृति (सृजनशील, गतिशील ऊर्जा) के संतुलन का द्योतक है। वर्षा ऋतु में मनाया जाने वाला यह पर्व, एक ओर पुनरुत्पादन और उर्वरता का प्रतीक है, तो दूसरी ओर यह दर्शाता है कि अनियंत्रित ऊर्जा विनाशकारी भी हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समय और जीवन के चक्र को चिह्नित करने वाले सांस्कृतिक संकेतक भी हैं, खासकर उन समाजों में जहां आधुनिक कैलेंडर या तकनीक का प्रयोग सीमित था। आज भी ग्रामीण भारत में लोग समय और घटनाओं का उल्लेख त्योहारों के माध्यम से करते हैं।
सुश्री डेलीना खोंगदुप ने देश की सांस्कृतिक विविधता और जीवंत परंपराओं को देखकर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि यद्यपि मेघालय में तीज नहीं मनाई जाती, परंतु सावन माह में मनाया जाने वाला ‘बेहदीनखलम’ पर्व भारतीय त्योहारों की निरंतरता का प्रतीक है। उन्होंने पुरुषों से महिलाओं के समान भागीदार बनने का आह्वान किया और वर्षों में विकसित पूर्वग्रहों को चुनौती देने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन और अपराधों के प्रति सजग रहने का आग्रह भी किया।
श्रीमती मालविका जोशी ने जनपद संपदा प्रभाग को सुंदर स्टॉल्स और प्रदर्शनी के लिए बधाई दी। उन्होंने देश में त्योहारों की निरंतरता की बात दोहराई और उनके सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया। अपने संबोधन के समापन पर उन्होंने भावनात्मक गीत “कारे बदरा रे, तू तो जुल्म किया — एक तो कारी रात, दूजे पिया परदेस” गाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
उत्सव का समापन ‘रंगा रंगा आर्ट कल्चरल एसोसिएशन’ द्वारा प्रस्तुत एक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ हुआ। पंजाब और हरियाणा की लोक संगीत और नृत्य शैलियों पर आधारित इस कार्यक्रम ने क्षेत्रीय परंपराओं की जीवंतता, रंग और उत्सवधर्मिता को मंच पर सजीव कर दिया।
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