त्रेता युग में प्रभु श्रीराम पांच कोस की परिक्रमा किये थे और पांच जगहों पर जो भोजन किये थे, श्रद्धालु भक्त उन्हीं चीजों को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। 24 नवंबर को श्रद्धालु बक्सर के चरित्रवन में प्रसाद के रूप में लिट्टी- चोखा ग्रहण करेंगे , त्रेता युग में इसी दिन प्रभु श्रीराम ने बक्सर में लिट्टी- चोखा खाया था । पंचकोसी परिक्रमा को लिए देश भर को साधु- संत , भक्त अहिरौली (Ahirouli) गांव में पहुंच चुके हैं। यहीं से पंचकोसी परिक्रमा (panchkoshi parikrama) शुरू होती है।
बिहार के प्रसिद्ध धार्मिक आयोजनों में शामिल पंचकोसी परिक्रमा
बिहार के प्रसिद्ध धार्मिक आयोजनों में से एक पंचकोसी परिक्रमा करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आते हैं। जो लोग बक्सर (Buxar) नहीं आ पाते हैं वे अपने घर पर ही प्रसाद बना कर खाते हैं. डाक्टर रामरक्षा मिश्र विमल, इंटक नेता केके काश्यप ने बताया कि इस आयोजन पर एक परंपरागत गीत भी बहुत प्रसिद्ध है- माई बिसरी बाबू बिसरी पंचकोसावा के लिट्टी चोखा नाहीं बिसरी।
इसलिए करते हैं पंचकोसी परिक्रमा:
भगवान श्रीराम त्रेता युग में पांच जगहों पर आए थे. तभी से पंचकोसी परिक्रमा(Panchkoshi Parikrama) अब तक चला आ रहा है. संतों का मानना है कि सृष्टि के मंगल और आत्मउद्धार के लिए यह परिक्रमा किया जाता है.
कहां से शुरू , कहां समापन :
अगहन माह में कृष्ण पक्ष की नवमीं तिथि को यह परिक्रमा बक्सर के चरित्र वन में संपन्न होता है. पंचकोसी परिक्रमा(Panchkoshi Parikrama) अहिरौली से शुरू होता है और चरित्र वन- बक्सर में इसका अगहन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को समापन होता है.
आज से परिक्रमा शुरू :
20 तारीख यानी बुधवार से पंचकोसी परिक्रमा (Panchkoshi Parikrama) बिहार के बक्सर जिले के अहिरौली गांव से शुरु होगा। अहिरौली गांव में अहिल्या माता का प्रभु श्रीराम ने उद्धार किया था।
अहिरौली में संतों व श्रद्धालुओं की भीड़ :
अहिरौली में श्रद्धालुओं और संतों की भीड़ लग चुकी है। पंचकोसी परिक्रमा (Panchkoshi Parikrama) यहीं से शुरू होगी और पांच गांवों से चलकर बक्सर पहुंचेगी।
परिक्रमा में पांच गांव शामिल :
पहला पड़ाव : गौतम ऋषि का आश्रम -अहिरौली. यहां गौतम ऋषि के श्राप से नारी से पत्थर बनीं माता अहिल्या का उद्धार हुआ था. यहां गंगा किनारे अहिल्या देवी का मंदिर है. अहिरौली गांव के शैलेश चौबे ने कहा कि मान्यता है कि संतान की प्राप्ति के लिए यहां मनौती मांगी जाती है, और पूरा होने पर नाच – गान कराया जाता है. यहां प्रसाद के रूप में पुआ – पकवान ग्रहण करने की प्रथा है.
दूसरा पड़ाव :
दूसरा पड़ाव नदांव गांव में होगा। यहां नारद मुनि का आश्रम है। नदांव गांव में प्रसाद के रूप में खिचड़ी खाने की प्रथा है। नदांव के विष्णु दत्त द्विवेदी ने कहा कि श्रद्धालु यहां पर खिचड़ी का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं.
तीसरा पड़ाव : पंचकोसी परिक्रमा(Panchkoshi Parikrama) के तहत तीसरा पड़ाव भभुअर गांव आता है। यहां भार्गव ऋषि का आश्रम है। भभुअर में भार्गवेश्वर महादेव का मंदिर है। यहां प्रसाद के रुप में चूड़ा-दही खाने की प्रथा है। यहां एक सरोवर भी है। गांव के रामप्रसाद ने कहा कि मान्यता है कि लक्ष्मण जी ने तीर से इस सरोवर का निर्माण किया था.
चौथा पड़ाव: चौथा पड़ाव बड़का नुआंव गांव है। यहां उद्दालक ऋषि का आश्रम है। बड़का नुआंव में अंजनी सरोवर भी हैं। यहां माता अंजनी अपने पुत्र हनुमान के साथ रहा करतीं थीं. गांव के सुजीत कुमार ने कहा कि यहां प्रसाद के रूप में सत्तू और मूली खाने की प्रथा है।
पांचवां पड़ाव – पंचकोसी परिक्रमा(Panchkoshi Parikrama) का पांचवां और अंतिम पड़ाव बक्सर का चरित्र वन है। यहां प्रसाद के रूप में लिट्टी चोखा खाने की प्रथा है। बक्सर निवासी वीरेंद्र पांडेय, दयांशंकर पांडेय व धीरेंद्र ओझा ने कहा कि यहां प्रभु श्रीराम ने विश्वामित्र मुनि के साथ लिट्टी चोखा का प्रसाद ग्रहण किया था। तब से लेकर आज तक यहां पंचकोसी मेला हर साल लगता है। इस पंचकोसी मेले में साधु -संत और श्रद्धालुजन की भारी भीड़ होती है। बिहार, उत्तर प्रदेश, व झारखंड से भी लोग बक्सर पहुंचते हैं।
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