केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के स्वायत्त संस्थान, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के कल्चरल इन्फॉर्मेटिक्स विभाग ने दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान के साथ मिलकर 700 साल पुरानी पंढरपुर वारी परंपरा पर एक अंतरराष्ट्रीय बैठक और प्रस्तुति का आयोजन किया। यह कार्यक्रम नई दिल्ली में आईजीएनसीए में परिसर आयोजित हुआ।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य दुनिया भर के लोगों को पंढरपुर वारी के बारे में बताना और इसे यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कराने के लिए समर्थन जुटाना था। इसमें कई देशों के दूतावासों के प्रतिनिधि, विद्वान, सांस्कृतिक नेता और नीति-निर्माता शामिल हुए। बैठक में आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान के अध्यक्ष श्री वैभव डांगे, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ श्री विजय चौथाईवाले, श्री विवेक गर्गे, आईजीएनसीए के डीन प्रो. सुधीर लाल और राजनयिक समुदाय के सदस्य मौजूद थे।
पंढरपुर वारी भारत की सबसे पुरानी जीवंत परंपराओं में से एक है। यह भक्ति, समानता, अनुशासन और सामूहिक भागीदारी का सुंदर संगम है। हर साल लाखों वारकरी पंढरपुर की पवित्र यात्रा करते हैं। यह परंपरा सात सौ साल से भी ज्यादा समय से चली आ रही है। यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि सामाजिक सद्भाव, सबको साथ लेकर चलने और मानवता के मूल्यों का प्रतीक है। इसलिए यह देश की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियों में से एक है।
कार्यक्रम की शुरुआत में आयोजकों ने कहा कि ऐसी जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं को पहचानना और उन्हें बचाना बहुत जरूरी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज को आकार देती रही हैं। इस बैठक से राजनयिकों और सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को पंढरपुर वारी के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को गहराई से समझने का मौका मिला।
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि संस्था भारत की विविध जीवंत परंपराओं को सहेजने और बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि पंढरपुर वारी सिर्फ एक तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत परंपरा है, जिसने सदियों से भक्ति, समानता और सामुदायिक भागीदारी के मूल्यों को बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि इसका वैश्विक सांस्कृतिक महत्व है और इसे यूनेस्को की सूची में अपना सही स्थान मिलना ही चाहिए।
दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान के अध्यक्ष श्री वैभव डांगे ने कहा कि वारकरी परंपरा को बचाने और दुनिया को इसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताने की जिम्मेदारी हम सबकी है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ने से इस अनमोल जीवंत विरासत को यूनेस्को की मान्यता दिलाने के प्रयास और मजबूत होंगे।
बैठक में पंढरपुर वारी के इतिहास, दर्शन और उसकी विरासत पर भी प्रस्तुतियां दी गईं। इसमें सामूहिक तीर्थयात्रा, भक्ति संगीत, साहित्य और सामुदायिक भागीदारी की अनोखी परंपरा पर प्रकाश डाला गया, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। चर्चा में यह भी बताया गया कि वारी भारत की विविधता भरी संस्कृति का जीता -जागता उदाहरण है और यह दुनिया में अमूर्त विरासत को बचाने की बातचीत में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
कार्यक्रम के अंत में सभी ने मिलकर संकल्प लिया कि वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पंढरपुर वारी के बारे में जागरूकता फैलाते रहेंगे और इसे यूनेस्को की सूची में शामिल कराने के प्रयासों का समर्थन करेंगे। यह एक ऐसी जीवंत सभ्यतागत परंपरा है, जहां आस्था, समानता, भक्ति और मानवता साथ-साथ चलती है।
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