लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 75 मिनट का भाषण इस बार सिर्फ ‘विकसित भारत 2047’ के विजन तक सीमित नहीं रहा। भाषण के केंद्र में देश का युवा रहा। प्रधानमंत्री ने एक करोड़ युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ट्रेनिंग देने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग शुरू करने और देशभर में 5 से 15 वर्ष के बच्चों की खेल प्रतिभा खोजने जैसी घोषणाएं कीं।साथ ही ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए उपद्रवियों से सावधान रहने की जरूरत पर बल दिया।
इन घोषणाओं को ऐसे समय में देखा जा रहा है जब देश के युवाओं में रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों, पेपर लीक और व्यवस्था में भ्रष्टाचार को लेकर असंतोष हाल के महीनों में सड़कों तक पहुंचा है। दिल्ली से लेकर दूसरे राज्यों तक हुए युवा प्रदर्शनों ने सरकार के सामने यह चुनौती रखी है कि भारत की बड़ी युवा आबादी को केवल ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ कहने से काम नहीं चलेगा, उसे रोजगार, कौशल और निष्पक्ष अवसर भी देने होंगे। Reuters ने हालिया युवा प्रदर्शनों को बेरोजगारी, परीक्षा-पत्र लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग से जोड़ा है।
ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री का एक करोड़ युवाओं को AI प्रशिक्षण देने का ऐलान खास महत्व रखता है। यह सिर्फ तकनीकी कौशल बढ़ाने की योजना नहीं, बल्कि तेजी से बदलती रोजगार व्यवस्था में युवाओं को भविष्य के अवसरों के लिए तैयार करने का राजनीतिक संदेश भी है। इसी तरह मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की घोषणा उस वर्ग को सीधे संबोधित करती है जो महंगी कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की कड़ी प्रतिस्पर्धा से परेशान है। Financial Times ने भी प्रधानमंत्री की इन घोषणाओं को हालिया युवा असंतोष और रोजगार तथा परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठे सवालों की पृष्ठभूमि में देखा है।
यानी लाल किले से मोदी का संदेश साफ था—युवा सिर्फ वोटर नहीं, सरकार की राजनीतिक प्राथमिकता हैं। लेकिन भाषण का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इससे बिल्कुल अलग था। प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जंगलों में हथियारबंद नक्सलवाद कमजोर पड़ चुका है, लेकिन वैचारिक स्तर पर देश में अशांति फैलाने वाले तत्वों से सतर्क रहने की जरूरत है। उन्होंने ऐसे तत्वों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने की बात कही।
राजनीतिक तौर पर इसे विपक्ष और सरकार विरोधी आंदोलनों के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री का संकेत यह था कि सरकार के खिलाफ असंतोष को संगठित करने या उसे व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप देने वाले तत्वों को सिर्फ सामान्य राजनीतिक विरोध के रूप में नहीं देखा जाएगा। विपक्ष ने इस शब्दावली पर सवाल उठाते हुए इसे असहमति को बदनाम करने की कोशिश बताया है।
इस तरह मोदी के भाषण में एक तरफ युवाओं को अवसर, प्रशिक्षण और भविष्य का सपना देने की कोशिश दिखाई दी, तो दूसरी तरफ सरकार विरोधी असंतोष की राजनीतिक व्याख्या और उस पर चेतावनी भी।
इसके पीछे आने वाले चुनावों का राजनीतिक संदर्भ भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं और 403 विधानसभा सीटों वाला यह देश का सबसे बड़ा विधानसभा चुनाव है। ऐसे में युवाओं का रुख किसी भी राजनीतिक दल के लिए निर्णायक हो सकता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, सरकारी भर्तियां और युवाओं के अवसर पहले से ही महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। इसलिए लाल किले से AI प्रशिक्षण, मुफ्त कोचिंग और खेल प्रतिभा खोज जैसे ऐलान केवल विकास योजनाओं के रूप में नहीं, बल्कि उस बड़े राजनीतिक वर्ग तक पहुंचने की कोशिश के तौर पर भी देखे जाएंगे जो आने वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
प्रधानमंत्री के भाषण की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक तस्वीर शायद यही है—युवा असंतोष का जवाब ‘अवसर’ के वादे से और सरकार विरोधी लामबंदी का जवाब ‘दिमागी नक्सल’ जैसी चेतावनी से।
एक ओर सरकार युवाओं को AI, कोचिंग, खेल, स्टार्टअप, ग्रीन इकोनॉमी और नए रोजगार के अवसरों का सपना दिखा रही है; दूसरी ओर वह यह भी संदेश दे रही है कि बेरोजगारी या व्यवस्था संबंधी असंतोष को राजनीतिक अस्थिरता में बदलने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी।
इसलिए स्वतंत्रता दिवस का यह भाषण केवल ‘विकसित भारत 2047’ का रोडमैप नहीं, बल्कि मौजूदा युवा असंतोष के बीच युवाओं को अपने साथ बनाए रखने और विपक्षी राजनीति को चुनौती देने की दोहरी रणनीति के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
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