पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव के फिर तेज होने और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से “एक साल तक सोना नहीं खरीदने” की अपील को विदेशी मीडिया भारत की विदेशी मुद्रा सुरक्षा रणनीति बता रहा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में कहा गया है कि तेल और सोने के आयात पर भारी निर्भरता के कारण भारत पर दोहरा दबाव बन रहा है और सरकार अब डॉलर बचाने के लिए जनता की भागीदारी चाहती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी 2026 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 728 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, लेकिन पश्चिम एशिया संकट, बढ़ती तेल कीमतों और रुपये को संभालने के लिए केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप के कारण यह घटकर मई के पहले सप्ताह में लगभग 690.69 अरब डॉलर रह गया। यानी करीब 38 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई।
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में सोना आयात करता है। युद्ध की आशंका बढ़ने के साथ तेल कीमतों में तेजी आई है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ रही है और रुपये पर दबाव बन रहा है। प्रधानमंत्री की अपील के बाद सर्राफा कारोबार से जुड़े आयातकों ने भारी मात्रा में डॉलर खरीदना शुरू कर दिया, जिससे रुपये पर और दबाव बढ़ा।
अमेरिकी अखबार Wall Street Journal ने इसे भारत की “फॉरेक्स डिफेंस स्ट्रैटेजी” कहा है। उल्लेखनीय है कि पीएम मोदी लोगों से सोना खरीद टालने, विदेश यात्राएं कम करने और ईंधन बचाने की अपील कर रही है ताकि विदेशी मुद्रा का देश के बाहर कम से कम जाए। भारत में सोना केवल निवेश नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, इसलिए प्रधानमंत्री की यह अपील असामान्य और गंभीर आर्थिक संकेत मानी जा रही है।
विदेशी मीडिया का कहना है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता है और हर साल अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। एक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया, जो कुल आयात बिल का लगभग 10 प्रतिशत है। विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया कि यदि सोने की खरीद में 30 से 50 प्रतिशत तक कमी आती है तो भारत 20 से 36 अरब डॉलर तक की विदेशी मुद्रा बचा सकता है।
एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया कि मार्च 2026 तक भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर 16.7 प्रतिशत हो गई है। भारतीय रिजर्व बैंक के पास 880 टन से अधिक सोना है और पिछले दो वर्षों में भारत ने अपने बड़े हिस्से का सोना विदेशों से वापस मंगाया है। रिपोर्ट के मुताबिक यह दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा डॉलर पर निर्भरता घटाने और सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
विदेशी आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया संकट और गहराता है तो भारत का चालू खाता घाटा और बढ़ सकता है। इसी आशंका के कारण सरकार ईंधन बचत, आयात नियंत्रण और डॉलर की मांग कम करने जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि सरकार भविष्य में सोने पर आयात शुल्क बढ़ाने जैसे कदम उठा सकती है, हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
निष्कर्ष यही है कि विधानसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री की अपील केवल नैतिक आग्रह नहीं बल्कि वैश्विक संकट के बीच भारत की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने की रणनीतिक कोशिश के रूप में देखी जा रही है।
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