मूल रूप से ओड़िया भाषी संघमित्रा रायगुरु ओड़िया भाषा में स्थापित कवयित्री , लेखिका और अनुवादक हैं. इन्होंने हिंदी और मैथिली से ओड़िया में बहुत सा अनुवाद किया है. संघमित्रा ने हिंदी में काफी कुछ लिखा है. इनके नौ कविता संग्रह ओड़िया में और तीन कविता संग्रह हिंदी में प्रकाशित हैं . इस संग्रह में शामिल की गई कविताओं में कहीं से ऐसा एहसास नहीं होता कि हिंदी संघमित्रा की मातृभाषा नहीं है.
कविताओं में व्यक्त भाव और प्रयुक्त शब्द सामान्य से बिल्कुल हटकर हैं. संभव है ओड़िया की समृद्ध भाषा संस्कृति ने भावों को अलग ढंग से व्यक्त करने में कहीं सहायक बनी हो! संघमित्रा ने मैथिली उपन्यास और कहानियों का अनुवाद तो उड़िया में किया ही है. इन्होंने उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के कालजयी रचनाओं का भी ओड़िया में अनुवाद किया है . प्रायः इसीलिए इनके शब्दों के चयन और अभिव्यक्ति में इतनी व्यापकता दिखती है.
“पंछी को क्या पसंद है” संग्रह में छप्पन कविताएं हैं . इन कविताओं को पढ़ते हुए एहसास होता है कि जीवन के ऐसे अनछुए पहलू भी कवयित्री का ध्यान आकर्षित करते हैं. कुछ शीर्षक देखिए कविताओं का : मन/गुम होती नदियां/लड़की की शादी/ नाव, कौवा और गुलाब/ संपर्क की फांस/ बिना नाम के लोग/ भाव के भगवान/ मैं ही प्रेमपत्र/धैर्य की ज्वाला/नवां अजूबा/ सांप – सीढ़ी का खेल/ रोटी की खुशबू में /बेवकूफ लड़की/पानी अब आग है/मुझे छू लेने से/ तुम/ प्रेम करो ,कवि – प्रेम करो/मुझे छू लेने से/ जलचक इत्यादि. शीर्षक देखकर पाठकों को इतना तो अनुमान हुआ ही होगा कि इन कविताओं को एक नारी की दृष्टि से व्यक्त किया गया है. नारी जीवन की विडम्बनाएं और पीड़ाएं इन कविताओं में बार बार उभर कर आती है.
इन दिनों बीसियों हिंदी कवित्रियों नारी मन की पीड़ा, व्यथा को व्यक्त कर रही हैं पर संघमित्रा की अभिव्यक्ति सब से हटकर हैं. इनकी कविताएं किसी ‘वाद ‘ को लेकर नहीं हैं, न ही ये किसी खास विचारधारा की प्रचारक हैं. इनकी कविता “गुलाब” के पंक्तियों को देखिये : “लाल गुलाब में/रेत का घर रचाया था -/जो अब समंदर में कहीं बह रहा है।/मैं डूबती हूँ/ उसके हर इशारे में।/ एक इशारा -/कितना कुछ कर सकता है ।/ कभी पास बुलाता है ,/कभी पीछे धकेलता है , फिर पवन के पंजे में/बादल के टुकड़े – सा/मुझे छोड़ देता है -/भटका, थका भीगा हुआ।” बहुत कम कवि कवियित्रियां को समुद्र किनारे रेत से बने घरों में और समुद्र की लहरों में कविता ढूंढी हो! इस संग्रह की कविताएं छोटी हैं. कुछेक कविताओं में विस्तार की संभावना दिखती है. संग्रह बहुत ही रोचक,पठनीय और आपके किताबों की आलमारी की शोभा बढ़ाने योग्य है.
संग्रह : पंछी को क्या पसंद है ? (कविता संग्रह) ,कवयित्री : संघमित्रा रायगुरु ,
प्रकाशन वर्ष:2025, प्रकाशक :New World Publication, पृष्ठ संख्या:168 मूल्य: रु 299.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
ये भी पढ़ें :-अति पठनीय है आलोचक, चिंतक डॉ खगेंद्र ठाकुर की “मुक्तिपथ का अनथक पथिक”
वाह ।बहुत शुक्रिया प्रमोद जी।आपके शब्दों ने मुझे प्रेरणा दी और आगे लिखने के लिए भी प्रेरित किया।