हास्य-व्यंग्य : नेताजी ने मां के नाम पर पौधा रोपा

आज नेताजी को अपनी मां की बहुत याद आ रही है। बार-बार गला भर आता है। एक-दो बार तो रोने का भी जी हुआ लेकिन आंसुओं को आंखों से टपकने नहीं दिया। सरकार ने अभियान शुरू किया है -एक पेड़ मां के नाम। हर किसी को मां के नाम पर एक पौधा लगाना है। इससे एक पेड़ तो लगेगा ही आपको कभी-कभी मां की याद भी आती रहेगी।

Written By : अनिल त्रिवेदी | Updated on: November 5, 2024 11:43 am
पौधा 
नेताजी के लिए पौधे लगाना बाएं हाथ का काम है। हर साल बारिश के मौसम में तो वे सैकड़ों पौधे लगाते ही हैं। बाकी महीनों में भी मौका मिलने पर अपने कोमल हाथों से पौधे खोंसते रहते हैं। इस बार का मामला पूरी तरह भावनात्मक है। इस पौधे से मां की स्मृति जुड़ेगी, इसलिए नेता जी का हृदय द्रवित है। पिछले साल जब पिताजी की याद में पेड़ लगाया था तब इतने भावुक नहीं थे। आज तो वे कोई भी पेड़ देखते हैं तो मां की स्मृति डोलने लगती है।
नेताजी ने पौधा लगाने के बारे में तत्काल कार्यकर्ताओं को अपनी भावना से अवगत कराया। कहा- मां के नाम पर एक पौधा लगाना है। अच्छी सी जगह बताओ जहां इसे स्थापित किया जाए। एक कार्यकर्ता बोला-  सर, अभी सड़क के किनारे कोई उपजाऊ जगह देखकर आता हूं। वह जैसे ही उठा, नेताजी ने रोक लिया- नहीं सड़क के किनारे लगाना ठीक नहीं है। पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर सड़क के किनारे दो सौ पौधे रोपे थे। उनमें से दो को छोड़कर कोई अगला गणतंत्र दिवस नहीं देख सका। वे दो पौधे भी अब तृणमूल कांग्रेस के चुनाव निशान की तरह दिखते हैं।
इस बार पौधा मां की याद से जुड़ा है इसलिए ऐसी जगह रोपा जाएगा जो घर के आसपास हो। खूब फले-फूले और आते-जाते दिखे तो मां की याद दिलाता रहे।
एक उत्साही कार्यकर्ता ने सुझाव दिया-सर, फिर तो सामने वाले पार्क में पौधा लगाना सबसे अच्छा रहेगा। नेताजी को यह सुझाव रास आया। सामने के पार्क में पौधा लगाना एकदम सही रहेगा। नेताजी ने उससे कहा कि तुरंत देखकर आओ पौधा कहां लगाया जा सकता है। वह दौड़ा गया और थोड़ी देर बाद लौटकर बताया कि पार्क के पश्चिमी कोने में मां की याद के लिए जगह उपयुक्त रहेगी। वहां अभी किसी ने आम का पौधा लगा रखा है। उसे मैं अंधेरे में निपटा दूंगा। आम का क्या मतलब, जहां देखो वहां आम के पौधे लगे हैं। आम खाया जहां गुठली फेंक दी वहीं निकल आया पौधा। नेताजी पहले थोड़े सकुचे, फिर उसकी बात मान गए।
पौधे के लिए जगह तय हुई
पौधे के लिए जगह तय हो गई, पार्क का कोना। अब मसला आया कि कौन सा पौधा लगाया जाए। सब माथापच्ची में लग गए। एक ने राय दी कि नीम का पौधा लगाना ठीक रहेगा। नेताजी बिगड़ गए। कहा- बकरियों को नीम बहुत प्रिय है। भूल गए जब बीते साल पिताजी की याद में नीम का पौधा लगाया था। अगले ही दिन बकरी ने साफ कर दिया था। फिर दूसरे दिन उसी जगह बेल का पेड़ रोपना पड़ा था। कुछ देर की खामोशी के बाद दूसरा बोला- सर, बबूल का पौधा कैसा रहेगा। जानवर भी इससे दूर ही रहेंगे। नेताजी ने उसे डपटा- बबूल का पेड़ भी कोई लगाता है। यह तो अपने आप उग आता है। कुछ और सोचो।
आंवले के पौधे पर बनी बात
एक सुझाव आया कि सर मनी प्लांट लगाएं तो कैसा रहेगा? इसमें मनी भी है और प्लांट भी। आपको दोनों प्रिय हैं। नेताजी को हंसी आ गई। बोले- अरे यह तो गमले का पौधा है। मां की याद में इसे लगाकर क्या हंसी करवानी है। बाकी सब भी हंसने लगे। नेताजी का सबसे प्रिय कार्यकर्ता बोला- सर, मेरी राय में आप आंवला का पौधा लगाएं। मां को आंवले पसंद भी थे। साल में एक बार इच्छा नवमी को उसकी पूजा भी होगी तो मां को बहुत खुशी होगी।
तालियां बजीं, कैमरे चमके 
नेताजी को यह राय सर्वोत्तम लगी और तय हो गया कि अगले दिन सुबह नौ बजे पार्क के कोने में नेताजी मां के नाम एक पेड़ लगाएंगे। आंवले का पौधा आ गया। तय मुहूर्त पर नेताजी अपने कार्यकर्ताओं के साथ पहुंचे। पौधे के लिए गड्ढा तड़के ही तैयार कर दिया गया था। नेताजी को बस पौधे को अपने हाथों से गड्ढे में रखना था। पत्नी-बच्चों और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में नेताजी ने जैसे ही पौधा रोपा तालियां बजने लगीं। मोबाइल के कैमरे चमक उठे। कुछ लोग पौधे के आसपास के गड्ढे में मिट्टी भरने लगे। नेताजी की जय-जय होने लगी और नेताजी मां की याद में भावविभोर हो गए।
मातृ ऋण से मुक्त होने का भाव जगा
मां के नाम एक पेड़ लगाकर नेताजी को ऐसा लग रहा था जैसे वे आज मातृ ऋण से मुक्त हो गए हों। वे नहीं चाहते थे कि पिताजी की याद में लगाए पेड़ की तरह इसे भी कोई जानवर नुकसान पहुंचाए इसलिए एक कार्यकर्ता को उन्होंने पौधे पर निगाह रखने का जिम्मा सौंप दिया। शाम को नेताजी उसके दर्शन करने गए तो कार्यकर्ता ने बताया- कुछ देर पहले एक कुत्ता पौधे के आसपास था और इसे ललचाई नजरों से देख रहा था। पौधे के नजदीक पहुंचा तो मैंने उसे धत-धत करके भगा दिया। नेताजी चौंके- कुछ कर तो नहीं गया। उसने कहा- नहीं-नहीं सर। करने के मूड में था लेकिन मैंने उसे दौड़ा लिया। लेकिन बार-बार पीछे मुड़कर ऐसे देख रहा था जैसे चुनौती दे रहा हो, देखते हैं तू कब तक रखवाली करता है, मौका पाकर मैं अपना काम जरूर करूंगा। नेताजी ने उसे और सतर्क रहने को कहा।
दूसरे दिन गायब हो गया पौधा
अगले दिन सुबह पार्क में टहल रहे लोगों की नजर गई तो देखा कि नेताजी ने मां की याद में जो पौधा लगाया था वह है ही नहीं। हड़कंप मचा तो नेताजी भी दौड़े-दौड़े आए। किसी ने बताया कि यह अनहोनी रात में हुई। एक गाय किसी तरह पार्क में अंदर पहुंच गई थी। जरूर उसी ने पौधे का सफाया किया होगा। गाय का मामला था इसलिए सभी चुप हो गए। नेताजी के दिल को बहुत ठेस लगी। मां की याद अगले दिन ही धूमिल हो गई। जिस कार्यकर्ता को उन्होंने सुरक्षा का जिम्मा सौंपा था वह रात भर तो पहरा दे नहीं सकता था।
मां के नाम पौधा फिर लगाने की तैयारी 
नेताजी अब उसी जगह फिर से पौधा रोपने की सोच रहे हैं। आखिर मां के नाम पेड़ तो वे जरूर लगाएंगे। यह सरकार का अभियान भी है और मां के प्रति उनका कर्तव्य भी। अब नया पौधा मंगाया गया है।

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