कुछ दिन पूर्व उनकी जन्म शताब्दी मनाई गई .पूरे भारत एवं विदेश के सैकड़ों छात्रों ने उनपर पी एच डी किया है! 14 अप्रैल 2021 को फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ,रांची ने एक संगोष्ठी आयोजित की थी. इसमें बहुत सारे विद्वानों ने भाग लिया और महत्वपूर्ण लेख पढ़े .विषय भी बहुत रोचक था कि:” फणीश्वर नाथ रेणु का साहित्यिक और क्रांतिकारी जीवन “. ध्यातव्य है कि रेणु जी बंगला के प्रातिष्ठित उपन्यासकार सतीनाथ भादुड़ी(‘ढोढाई चरितमानस ‘के लेखक) के बहुत निकट संपर्क में रहे. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन ,नेपाल के लोकतंत्र आंदोलन से इनका गहरा जुड़ाव रहा था .
बी पी कोइराला इनके निकट मित्रों में रहे.रेणुजी हिंदी, मैथिली, बंगला, नेपाली,अंग्रेज़ी इत्यादि के बहुत अच्छे ज्ञाता थे . प्रस्तुत पुस्तक उस विचार गोष्ठी में पढ़े गए आलेखों का संपादित संकलन है . इस पुस्तक में तेरह विद्वानों का लेख सम्मिलित है. 1. हमारी निधि है रेणु की कहानियां (आलोकधन्वा) 2.कितने हीरामन! (भारत यायावर) 3.रूप का वह आकर्षण मतलब बिन डोर खिंच जाना(भारत यायावर) 4.रेणु से मैंने पूछा,’आपने पॉलिटिक्स क्यों छोड़ दी (भारत यायावर) 5.रेणु की कहानियों का अंतः मार्ग(भारत यायावर ) 6.बिहार के समकालीन यशस्वी साहित्यकार: रेणु एवं ज्योतिंद्र प्रसाद ‘पंकज'(अमरनाथ झा)7.परती भूमि और जीवन का दर्द :(कमल बोस )8. रेणु और उनका कथा-रिपोतार्ज (सदन झा) 9.फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ के उपन्यास (राकेश रेणु) 10.रेणु के साहित्यिक निर्माण में जन आंदोलनों की भूमिका (पुष्यमित्र) 11.रेणु के साहित्य में खबरनवीसी(ब्रजेश कुमार ) 13.लोक नृत्य परम्परा और विदापत नाच (मनोज कुमार ) 14.पिता,साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सेनानी के रूप में रेणु (दक्षिणेश्वर रेणु .) अपने लेख के प्रारंभ में कवि आलोकधन्वा लिखते हैं ” रेणु के रचना संसार में जो गहरी लय दिखती है,वह हमें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की जिजीविषा देती है।
जन-आंदोलनों के बीच में उन्होंने मनुष्य के अधिकारों की पाठशाला में दाखिला लिया।” इतिहासकार सदन अपने लेख में कहते है ,” रेणु और उनके क्रांति की बात महज राजनीति के तयशुदा खाँचों के तहत नहीं हो सकती। उनके लिए क्रांति का अर्थ राजनैतिक और सामाजिक धरातल पर समानता, शोषण का विरोध तो था ही लेकिन यह सृजन आउट भाषा की सीमाओं के खिलाफ भी संघर्ष था।एक ऐसा संघर्ष जिससे मानवीय अनुभवों और संवेदनाओं को अधिक गहरे और पीने रूपों में अभिव्यक्ति मिल सके।इस धरातल पर,उनके लिए सृजन का अर्थ हिन्दी भाषा की सीमाओं का विस्तार भी था।”
संग्रह में पत्रकार लेखक पुष्यमित्र का लेख अति महत्वपूर्ण है .इन्होंने क्रांतिकारी रेणु से लेखक रेणु बनने की पूरी परिस्थिति और उनके तत्कालीन संपर्कों और प्रभावों का विस्तृत वर्णन किया है . पुस्तक के सभी समीक्षकों के लेख महत्वपूर्ण हैं. पुस्तक के सारे लेख कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के लेखन को समझने में बहुत सहायक सिद्ध होगी ! पुस्तक की छपाई और फॉन्ट बहुत उत्तम श्रेणी का है .प्रकाशक ने अच्छे कागज का भी इस्तेमाल किया है . पुस्तक पठनीय एवं अति संग्रहणीय है . पुस्तक में लेखक फणीश्वर नाथ रेणु के महत्वपूर्ण श्वेतश्याम तस्वीरों को भी शामिल किया गया है.
पुस्तक: फणीश्वरनाथ ‘ रेणु’ ,समय साहित्य और समाज के शिल्पी
संपादन:प्रधान संपादक -डॉ. सच्चिदानंद जोशी , संपादक -डॉ. कुमार संजय झा ,
पृष्ठ:195 (हार्डबाउंड),प्रकाशक :इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ,
जनपथ भवन, जनपथ, वेस्टर्न कोर्ट के समीप , नई दिल्ली-110001. मूल्य:रु .900.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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