प्रेम क्या है… मोह और प्रेम के अंतर को समझें

कबीरदास ने कहा - पोथी पढ़ी पढ़ी जुग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।  कहते हैं -  प्रेम ही ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र साधन है। हे मानव! अपनी चतुराई त्याग दे क्योंकि केवल शब्दों से तू ईश्वर से कभी नहीं जुड़ सकता। प्रेम की कसौटी यह है कि मन की सारी मलिनता नष्ट हो जाती है।

Written By : मृदुला दुबे | Updated on: November 4, 2024 10:22 pm
Love यानि प्रेम में पूर्ण समर्पण
कबीरदास के प्रेम में पूर्ण समर्पण है। प्रेम के अतिरिक्त सभी शास्त्र बेकार हैं, प्रेम से शून्य सारे शास्त्र शून्य हैं। सारा ज्ञान बोझ है, मझधार में डुबोने वाला है, पार – लगाने वाला नहीं है।
प्रेम में अन्य के लिए केवल कल्याण की भावना
निश्चल प्रेम में अन्य के लिए केवल कल्याण की भावना होती है। प्रेमी मनुष्य शास्त्रों का सम्मान करता है और अपने मन तथा वाणी से किसी को भी कष्ट नहीं देता। विकार मुक्त ह्रदय ही प्रेम कर सकता है सच्चा प्रेम वही है, जब मनुष्य के मन में कोई विकार नहीं रहता।
सहजोबाई कहती हैं “प्रेम दीवाने जो भए, मन भयो चकनाचूर। छके रहे घूमत रहैं, सहजो देखि हजूर।।
सहजोबाई कहती हैं कि जो व्यक्ति ईश्वरीय प्रेम के दीवाने हो जाते हैं, उनके मन की सांसारिक वासनाएं, कामनाएं एकदम चूर-चूर हो जाती हैं। ऐसे लोग आनन्द से सदा तृप्त रहते हैं तथा संसार में घूमते हुए परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं।
भक्ति में बदल जाता है सच्चा प्रेम
हंस  के तू पीले विष का प्याला, काहे का डर तोरे संग गोपाला। तेरे तन की न होगी हानि, कृष्ण दीवानी मीरा। मीरा कृष्ण को अपना प्रियतम मानकर प्रेम करती थीं। सच्चा प्यार भक्ति में बदल जाता है ,जहां दो नहीं रहते। सच्चे प्रेम में कोई मांग नहीं रहती। मीरा ने सब कुछ त्याग कर भी सबकुछ पा लिया था, उन्हें कृष्ण दीवानी कहा जाने लगा था। मीरा ने सिखाया कि प्रेम का अर्थ हासिल करना नहीं है। जब संपूर्ण ब्रह्मांड में किसी से भी हमारा बैर न रहे तब समझना कि हम प्रेममय हैं।
मोह को प्रेम समझने की भूल
मनुष्य अपने मोह को ही Love समझ बैठता है जैसे – धृतराष्ट्र को दुर्योधन से बहुत ज्यादा मोह था जिस कारण उन्होंने अपने सर्वनाश को नजर अंदाज किया। कैकेई ने भी अपने पुत्र मोह को प्रेम समझा और बहुत अनर्थ कर बैठी। राम के भीतर मोह न होकर प्रेम था। राम 14 वर्ष बाद अयोध्या लौटने पर सबसे पहले मां कैकेई से मिलने गए ताकि मां को कोई ग्लानि न हो।
बुद्ध ने प्रेम की जगह मैत्री को दी
बुद्ध की सहनशीलता व मैत्री भावना महान है। बुद्ध की मैत्री भावना का अर्थ मित्रता व भाईचारे की भावना है, इसमें ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, शत्रुता, क्रूरता, वैमनस्य, अहित व बदले की भावना नहीं होती, इसका क्षेत्र मनुष्यों तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि बुद्ध ने पशु -पक्षियों व पेड़ पौधों के प्रति भी मैत्री भावना रखने का संदेश दिया है। बुद्ध कहते हैं – शान्ति पद की प्राप्ति चाहने वाले को कल्याण साधन में निपुण होना चाहिए। वह सरल, संतोषी, सादा जीवन बिताने वाला बने व उसकी इंद्रियां शांत हों। तथागत बुद्ध ने Love की जगह मैत्री को दी। बुद्ध जब वन से गुजरते तब पत्ते भी सुख पाते थे, पहाड़ मुस्करा लेते थे।

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