करपात्री जी का आरंभिक जीवन परिचय और दीक्षा:
स्वामी करपात्री जी का जन्म विक्रमी संवत 1964 (1907 ई.) में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के भटनी ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम रामनिधि ओझा और माता का नाम शिवरानी था। बचपन से ही वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे।
9 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह हुआ, किंतु 19 वर्ष की आयु में उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यास ले लिया। वे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से दीक्षित हुए और ‘हरिहर चैतन्य’ कहलाए। काशी में उन्होंने संपूर्ण वेद, उपनिषद, और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उनकी तपस्या और त्यागमयी साधना के कारण उन्हें ‘करपात्री’ नाम मिला, क्योंकि वे भोजन हेतु पात्र का उपयोग न कर अपने हाथों (कर) का उपयोग करते थे।
दोहे:
“त्याग-तपस्या का प्रतीक, धर्मसिंह थे वीर।
करपात्री तप भानु सम, जग में किए अधीर।”
तपस्वी जीवन
स्वामी करपात्री जी का जीवन साधना, त्याग, और तपस्या का उदाहरण था। वे दिन में केवल एक बार भिक्षा ग्रहण करते और भूमिशयन (भूमि पर सोना) करते थे। त्रिकाल स्नान और ध्यान उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। हिमालय में कठोर तपस्या के बाद वे वाराणसी में स्थिर हुए और धर्म प्रचार को जीवन समर्पित किया।
उनकी कठोर साधना और अद्भुत ज्ञान के कारण उन्हें श्रीविद्या दीक्षा में ‘षोडशानंद नाथ’ नाम प्राप्त हुआ।
धर्म और राजनीति में योगदान
स्वामी करपात्री जी ने धर्म और राजनीति को समरसता प्रदान करने का प्रयास किया। उन्होंने सनातन धर्म की रक्षा के लिए 1948 में ‘अखिल भारतीय राम राज्य परिषद’ की स्थापना की। यह राजनीतिक दल धर्म आधारित शासन प्रणाली को स्थापित करने के लिए कार्यरत था।
रामराज्य परिषद ने 1952 के पहले आम चुनाव में उल्लेखनीय सफलता पाई और राजस्थान में विधानसभा की कई सीटों पर जीत हासिल की। उन्होंने धर्म सापेक्ष राजनीति और गौरक्षा के लिए आंदोलन चलाए।
उद्धरण:
“धर्म से विमुख राजनीति केवल अराजकता को जन्म देती है।”
गौरक्षा आंदोलन:
स्वामी करपात्री जी ने 1966 में ऐतिहासिक गौरक्षा आंदोलन का नेतृत्व किया। इस आंदोलन का उद्देश्य गायों के वध पर संपूर्ण प्रतिबंध लगाना था।
7 नवंबर 1966 को संसद भवन के सामने संतों और अनुयायियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। लेकिन इंदिरा गांधी सरकार के आदेश पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, जिसमें कई संत शहीद हुए। इस घटना ने स्वामी जी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रसिद्ध कर दिया।
दोहे:
“गाय हमारे धर्म की, है आधार महान।
रक्षा हित करपात्री ने, किया संघर्ष महान।”
रचनात्मक योगदान
स्वामी करपात्री जी ने धर्म, दर्शन, और राजनीति पर कई ग्रंथों की रचना की। उनके प्रमुख ग्रंथ हैं:
1. वेदार्थ पारिजात
2. रामायण मीमांसा
3. विचार पीयूष
4. मार्क्सवाद और रामराज्य
इन ग्रंथों में भारतीय परंपरा, समाज व्यवस्था, और धर्म के मूल सिद्धांतों का विश्लेषण किया गया है।
दोहे:
“वेद पुराण की ज्योति से, भारत को दी राह।
करपात्री ने जगत को, दिया धर्म की चाह।
ब्रह्मलीन और उपसंहार
माघ शुक्ल चतुर्दशी, विक्रमी संवत 2038 (7 फरवरी 1982) को वाराणसी के केदारघाट पर स्वामी करपात्री जी ने ब्रह्मलीन होकर अपने शरीर का त्याग किया। उनकी इच्छा के अनुसार, उन्हें गंगा में जल समाधि दी गई।
स्वामी करपात्री जी का जीवन त्याग, तपस्या, और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक था। उन्होंने भारतीय संस्कृति, धर्म, और राजनीति को नई दिशा दी। उनके योगदान को सदा स्मरण किया जाएगा।
दोहे:
“धर्म निष्ठ त्यागी तपस्वी, करपात्री थे वीर।
जिनसे फिर भारत बना, वैदिक धर्म अधीर।”

(मृदुला दुबे योग प्रशि और आध्यात्मिक विचारक हैं.)
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