एक हल्के व्यंग्य के साथ सूत्रों की व्याख्या लोगों को लंबे समय तक याद रह जाती है. हिंदी में ऐसा लेखन पद्य में कम ही हुआ है . गद्य में कृष्ण चंदर, शरद जोशी और हरिशंकर परसाई जी ने भी कहीं कहीं व्यंग्यात्मक व्याख्याएं की हैं. यहां कहानीकार नरेंद्र कोहली जी की चर्चा भी अप्रासंगिक नही होगी. उन्होंने हिंदू धर्म के ऐतिहासिक पात्रों और कहानी को ही बहुत रोचक और व्यंग्यात्मक तरीके से प्रस्तुत किया है. इस कड़ी में नरेश अग्रवाल एक अलग लकीर खींचते दिखाई देते है.कई कविता, कहानी और अन्य विधाओं में पुस्तक प्रकाशन के बाद दोहों की तरह एक पंक्ति में सूत्रों की तरह कविताऐं लिखी हैं.इसे जापानी ‘हाइकु ‘ से अधिक दोहों के अधिक समीप पाता हूं. एक पंक्ति में ही बहुत काव्यात्मक ढंग से अपनी बात कह जाते हैं नरेश जी.
एक सौ चार पृष्ठ के इस संग्रह में सिर्फ एक पंक्ति के सूत्र हैं जिसे आप कविता का ही रूप मानेंगे .संग्रह में एक सौ पृष्ठ में सूत्र के रूप में सिर्फ कविताएं हैं.संग्रह के अंत में चार पृष्ठ में देश के प्रतिष्ठित कवियों,लेखकों ने नरेश जी के लेखनी के संबंध में अपने उद्गार व्यक्त किए हैं. प्रतिष्ठित हिंदी कवि अरुण कमल जी कहते हैं..” नरेश जी ने कम – से – कम में अधिक -से – अधिक कहने की महारथ हासिल की है।नुकीले वाक्य सीधे निशाने पर लगते हैं। कोई भी पाठक इन्हें एक नज़र में ही हृदयंगम कर लेता है।….” संग्रह के प्रारंभ में नरेश अग्रवाल जी “अपनी बात “में कहते हैं: “प्राचीन संस्कृत से लेकर आज तक की सभी भारतीय भाषाओं में सूत्र काव्य रचना की दीर्घ परंपरा मिलती है।
इनके आकर की लघुता ही इन्हें विशेष और स्मरणीय बनाती है। सद्यः संप्रेषण ही इनकी ताकत रही है, जिनके आगे बड़ी काव्य रचनाएं भी कई बार हल्की लगने लगती है।….” “सूत्र काव्य” के कुछ सूत्रों को देखिए: ” लड़ाई: लड़ाई में शामिल कायर भी वीर ही कहलाता है” “लेखक: जीवन के अंधेरों को एक लेखक ही अच्छी तरह से देखता है ” “गंदगी: गंदे आदमी को गंदगी कभी बेचैन नहीं करती” ” हार: जिसे सब कुछ एक पल में चाहिए वही बार बार हारता है”। “मजदूर: मजदूरों की समस्या का निपटारा केवल उनके हाथ ही कर पाते हैं “।
इस संग्रह में लगभग नौ सौ ऐसी सूक्तियां हैं. नरेश जी की भाषा प्रांजल है और इन्होंने शब्दों का चयन बहुत सावधानी से किया है . संग्रह बहुत सुंदर कागज पर सफाई के साथ छपी है. कौशलेश पांडे की कलाकृति ने संग्रह की सुंदरता बढ़ा दी है. संग्रह रोचक और पठनीय तो है ही,आपके शेल्फ के संग्रह में उपस्थित होकर शोभा भी बढ़ाएगी!
संग्रह: सूत्र काव्य , कवि: नरेश अग्रवाल, पृष्ठ:104,
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन जयपुर, मूल्य: रु.150.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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अच्छी समीक्षा
निश्चित ही पुस्तक संग्रहणीय और पठनीय होगी। लो
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