यूनेस्को की विश्व स्मृति पर हुई अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी,दस्तावेज़ी विरासत की रक्षा के लिए क्षेत्रीय सहयोग पर बल

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और यूनेस्को, नई दिल्ली कार्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ‘दक्षिण एशिया में यूनेस्को की विश्व स्मृति’ (मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड) – मुद्दे और चुनौतियां” विषय पर एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी और तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन आईजीएनसीए के समवेत ऑडिटोरियम में संपन्न हुआ।

(बाएं से दाएं) श्री राम बहादुर राय, प्रो. रमेश चंद्र गौड़, श्री फैकसन बांडा और माले हज़ास
Written By : डेस्क | Updated on: May 31, 2025 10:46 pm

यूनेस्को और आईजीएनसीए की ओर से 28 मई को आयोजित अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी के बाद, अगले तीन दिनों- 29 से 31 मई तक, प्रो. गौड़ के मार्गदर्शन में, आईजीएनसीए ने तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य संस्थानों को व्यावहारिक डोजियर तैयार करने और क्षमता निर्माण कौशल से लैस करना था।

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में दक्षिण एशिया के विविध देशों – बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका – से विशेषज्ञ, अभिलेखपाल, शोधकर्ता एवं नीति-निर्माता एकत्रित हुए। इसका उद्देश्य क्षेत्र की समृद्ध दस्तावेज़ी विरासत को संरक्षित करने हेतु सामूहिक रणनीति विकसित करना था।

कार्यक्रम के प्रमुख अतिथियों में यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्य सुश्री जोई स्प्रिंगर, डॉक्यूमेंट्री हेरिटेज यूनिट (यूनेस्को, पेरिस) के प्रमुख डॉ. फैकसन बांडा, संस्कृति मंत्रालय की विशेष सचिव सुश्री रंजना चोपड़ा, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी एवं कार्यक्रम के सूत्रधार प्रो. रमेश चन्द्र गौड़ शामिल थे।

अपने स्वागत भाषण में प्रो. गौड़ ने संगोष्ठी की प्रासंगिकता और दस्तावेज़ी विरासत के डिजिटल युग में संरक्षण की जटिलताओं को रेखांकित किया। साथ ही, उन्होंने तीन दिवसीय व्यावहारिक कार्यशाला की घोषणा की, जिसका उद्देश्य डोजियर निर्माण एवं क्षमता-विकास में संस्थानों को प्रशिक्षित करना था।

यूनेस्को के प्रतिनिधि और नई दिल्ली स्थित यूनेस्को कार्यालय के निदेशक श्री टिम कर्टिस ने वीडियो संदेश के माध्यम से क्षेत्रीय सहभागिता और साझा दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया। सुश्री यूनेस्को स्प्रिंगर ने भारत की समृद्ध अभिलेखीय परम्पराओं की सराहना करते हुए रणनीतिक नामांकन की आवश्यकता को रेखांकित किया। डॉ. बांडा ने विश्व स्मृति कार्यक्रम के मूल सिद्धांतों और डिजिटल युग की चुनौतियों पर प्रकाश डाला।

केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की विशेष सचिव और वित्तीय सलाहकार सुश्री रंजना चोपड़ा ने सरला दास की ‘महाभारत एवं वृंदावन शोध संस्थान के दुर्लभ संग्रहों का उल्लेख करते हुए नीतिगत सहयोग और अंतर-संस्थागत समन्वय की आवश्यकता जताई।

संगोष्ठी के समापन सत्र में समापन सत्र में आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय ने दस्तावेज़ी विरासत के राष्ट्रीय महत्व को दोहराया और शासन और अंतरराष्ट्रीय समर्थन का आह्वान किया। उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई कि दस्तावेज़ी विरासत के संरक्षण के इतने महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम ‘यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ को इतनी देर 1992 में शुरू किया गया, यूनेस्को की स्थापना के लगभग पांच दशक बाद। यूनेस्को की सूचना एवं संचार अधिकारी सुश्री माले हज़ाज़ ने पारम्परिक अभिलेखीय प्रथाओं के साथ प्रौद्योगिकी को एकीकृत करने के महत्व पर जोर दिया। डॉ. फैकसन बांडा ने प्रतिभागियों को अपनी सहभागिता को और गहरा करने के लिए प्रोत्साहित किया और प्रशिक्षण कार्यशाला का पूर्वावलोकन किया। आईजीएनसीए के क्षेत्रीय केन्द्र पुडुचेरी के निदेशक सुमित डे ने मंच संचालन किया और कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन किया।
गौरतलब है कि प्रो. गौड़ के नेतृत्व में आईजीएनसीए द्वारा तैयार किए गए डोजियरों की बदौलत भारत की सात प्रविष्टियां ‘यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ के इंटरनेशनल और रीजनल रजिस्टर में शामिल की गईं। इनमें रामचरितमानस की चित्रित पांडुलिपि (राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित) और पंचतंत्र (भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में संरक्षित) जैसी कृतियां शामिल हैं। संगोष्ठी में इन उपलब्धियों का विशेष अभिनंदन किया गया और प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। गौरतलब है कि हाल ही में ‘भगवद्गीता’ और भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ को ‘यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ के इंटरनेशनल रजिस्टर में शामिल किया गया है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट भी किया था।
इस संगोष्ठी और कार्यशाला ने दक्षिण एशिया में यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड मिशन को आगे बढ़ाने में आईजीएनसीए की महत्वपूर्ण भूमिका की पुष्टि की और एक केन्द्रित क्षेत्रीय प्रशिक्षण पहल की शुरुआत की।

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