डा अनिल सुलभ ने कहा कि आधुनिक हिन्दी के उन्नयन में बिहार के साहित्यकारों ने अन्यतम योगदान दिया है, किंतु ‘साहित्य के इतिहास’ में बिहार के हिन्दी-सेवियों की चर्चा अत्यंत गौण है। जमुआर जी ने इस बड़े अभाव की पूर्ति में अपना अमूल्य योगदान दिया। तीन खण्डों में प्रकाशित ‘बिहार के दिवंगत हिन्दी साहित्यकार’ एवं ‘बिहार के साहित्यकारों की साहित्य यात्रा’ में, उन्होंने बिहार के साढ़े तीन सौ से अधिक हिन्दी-सेवियों के अवदानों को सारगर्भित रूप में प्रकाश दिया। इन ग्रंथों में इनकी विद्वता, अन्वेषण-धर्मिता और लेखन-सामर्थ्य का भी परिचय मिलता है।
सर्जन ही नहीं सर्जक भी थे डा जितेंद्र सहाय, गीत-ऋषिका थी डा शांति जैन
डा जितेंद्र सहाय को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि डाक्टर साहब ने जिस कौशल से चाकु चलाया उसी कौशल से लेखनी भी चलाई। जिन दिनों वे साहित्य सम्मेलन के उपाध्यक्ष थे, मैं भी उपाध्यक्ष के रूप में उनके साथ सम्मेलन की सेवा कर रहा था। वे एक प्रभावशाली नाटककार भी थे। ‘निन्यानबे का फेर’, ‘मुण्डन’ , ‘बग़ल का किरायदार’, ‘महाभाव’ आदि उनके चर्चित नाटक रहे, जिनके मंचन पटना एवं अन्य नगरों में प्रायः होते रहे।
सुप्रसिद्ध कवयित्री डा शांति जैन को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने कहा कि गीति-साहित्य की तपस्विनी साधिका थीं शांति जी। उन्होंने अविवाहित रह कर एक ऋषिका की भाँति साहित्य देवता की जीवन भर पूजा करती रहीं। उनके इस बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
समारोह का उद्घाटन करते हुए, उपभोक्ता संरक्षण आयोग, बिहार के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा कि डा सहाय समाज और संस्कृति के महान सेवक थे। उन्होंने चिकित्सा के माध्यम से समाज की सेवा की। कला और साहित्य के क्षेत्र में उनका बदा योगदान है। वे अत्यंत विनम्र और मृदुभाषी थे। एक चिकित्सक के रूप में उन्होंने पीड़ित समाज की सेवा की और एक लेखक के रूप में साहित्य और संस्कृति की।
डा सहाय की पुत्रवधू और पटना उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव ने कहा कि उनके श्वसुर डा सहाय एक पिता की तरह थे । उन्होंने साहित्य की सेवा जिस प्रतिबद्धता से की, वह निष्ठा नयी पीढ़ी में नहीं दिखायी देती है। नयी पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने के लिए साहित्य सम्मेलन को विशेष प्रयास करना चाहिए । इस हेतु किसी प्रकार की सहायता कर मुझे भी प्रसन्नता होगी!
डा सहाय के ज्येष्ठ पुत्र और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की में प्राध्यापक प्रो उज्ज्वल प्रकाश ने कहा कि उनके पिता चिकित्सा एवं साहित्य-सेवा में बहुत व्यस्त रहते थे। फिर भी हम सबके लिए हमेशा उपलब्ध रहते थे। वे अंग्रेज़ी और हिन्दी,दोनों भाषाओं के विद्वान लेखक थे। उनके आलेख हिन्दी और अंग्रेज़ी समाचार पत्रों में प्रायः छपा करते थे।
डा जमुआर के कवि-पुत्र और दूरदर्शन, बिहार के कार्यक्रम-प्रमुख रहे डा ओम् प्रकाश जमुआर ने अपने पिता को स्मरण करते हुए कहा कि जो साहित्यकार अपनी सेवा देकर चले जाते हैं, उनकी कृतियों की समीक्षा की जानी चाहिए। उनके अवदानों को स्मरण किया जाना चाहिए। मेरे पिताजी ने अपने इसी कर्तव्य को पूरा किया।
सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, डा सहाय के पुत्र और अधिवक्ता अमित प्रकाश, डा शांति जैन की भ्रातृज मनोज जैन, डा रत्नेश्वर सिंह, डा मेहता नगेंद्र सिंह, विभारानी श्रीवास्तव, डा विद्या रानी चौधरी और वीणा अम्बष्ठ ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ शायर आरपी घायल, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, डा मीना कुमारी परिहार, कुमार अनुपम, ईं अशोक कुमार, सदानंद प्रसाद, मृत्युंजय गोविंद, डा शालिनी पाण्डेय, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, इंदुभूषण सहाय, शंभु अमिताभ, प्रेरणा प्रिया, सूर्यदेव सिंह आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपने मधुर गीतों से तीनों साहित्यिक विभूतियों को काव्यांजलि दी। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
वरिष्ठ व्यंगकार बाँके बिहारी साव, उर्मिला नारायण, रचना जैन, कल्पना जैन, डा प्रेम प्रकाश, सीमा सिन्हा, भास्कर त्रिपाठी आदि प्रबुद्ध श्रोता समारोह में उपस्थित रहे।
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