संस्कृति और सभ्यता में तालमेल न हो, तो संकट पैदा हो जाता है: प्रो. नंदकिशोर आचार्य

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि विभाग द्वारा ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मारक व्याख्यान’ का आयोजन किया गया। विषय था- ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का संस्कृति-चिन्तन’ और वक्ता थे प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. नंदकिशोर आचार्य। व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता की आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने। कार्यक्रम के प्रारम्भ में आईजीएनसीए के कलानिधि विभाग के अध्यक्ष एवं डीन, प्रशासन प्रो. रमेश चन्द्र गौड़ ने अतिथियों का परिचय और स्वागत भाषण दिया।

(बाएं से दाएं) प्रो. रमेश चंद्र गौड़, श्री रामबहादुर राय और प्रो. नन्दकिशोर आचार्य
Written By : ध्रुव गुप्ता | Updated on: August 22, 2025 11:03 pm

अपने उद्बोधन में प्रो. नन्दकिशोर आचार्य ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के संस्कृति-चिंतन पर गहन विमर्श प्रस्तुत किया और उन्हें भारतीय संस्कृति का गंभीर चिंतक बताया। उन्होंने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के संस्कृति चिंतन के बारे में बहुत कम लिखा गया है, जबकि उनकी रचनावली का एक पूरा खंड (नौवां खंड) संस्कृति सम्बंधी चिंतन पर ही है। अपने भाषण के प्रारम्भ में उन्होंने संस्कृति और सभ्यता के अंतर पर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संस्कृति और सभ्यता अपने बाहरी आचरण में कुछ भिन्न होती हैं, लेकिन उनमें गहरी पारस्परिकता होती है, या होनी चाहिए। अगर वह नहीं होती है, तो पूरा जीवन ही विच्छृंखल होता जाता है। जब संस्कृति और सभ्यता में एकसूत्रता नहीं होती है, तो बहुत बड़ा संकट पैदा हो जाता है।

उन्होंने कहा कि आचार्य द्विवेदी संस्कृति को परिभाषित करते हुए कहते हैं – “संस्कृति अंतर का विकास है। यानी आंतरिक जीवन का विकास। उसमें आप आध्यात्मिकता ले लीजिए और कई दूसरी चीजें जोड़ लीजिए। लेकिन उसमें केवल आध्यात्मिकता होना आवश्यक नहीं है, क्योंकि वे वे कह रहे हैं – अंतर का विकास और अंतर का आनंद। वे यह भी कहते हैं कि सभ्यता जो है, वह बाह्य व्यवस्था से सम्बंधित है। यानी हमारे सामाजिक संगठन, राजनीतिक संरचनाएं, आर्थिक प्रक्रियाएं, सामाजिक और दूसरे प्रकार की चीजें – इनका सम्बंध सभ्यता से है।”
प्रो. नंदकिशोर आचार्य ने डॉ. देवराज को उद्धृत करते हुए कहा कि मूल्य दो प्रकार के होते हैं। एक साधनात्मक मूल्य और एक साध्य मूल्य। संस्कृति साध्य मूल्य है और सभ्यता साधनात्मक मूल्य। यानी सभ्यता एक साधन है, जिसके माध्यम से हम उन मूल्यों को प्राप्त करते हैं, जिनका निर्देश संस्कृति करती है।

प्रो. नन्दकिशोर आचार्य ने यह भी कहा कि मूल रूप से संस्कृति एक मूल्यानुभूति है। अवधारणा के स्तर पर संस्कृति बहुत मूल्यवान चीज़ है। जो मूल्य संस्कृति ने सुझाए हैं, क्या हमारा सारा बाह्य जीवन उनके अनुरूप है? अगर वह उनके अनुरूप नहीं है, तो दोनों के बीच में द्वैत पैदा हो जाता है। और जब सभ्यता, संस्कृति से विच्छिन्न हो जाती है, तो गांधी जी के शब्दों में केवल कोलाहल रह जाता है। हमारी राजनीतिक संरचना, हमारी सामाजिक व्यवस्था, हमारी आर्थिक प्रक्रियाएं – ये सब इस तरह संचालित की जाएं कि सांस्कृतिक मूल्यों की ओर समाज बढ़ सके।
उन्होनें कहा, हजारीप्रसाद जी कहते हैं कि मूल्य का स्रोत हैं विश्वजनित सत्य। मूल्य पूरी मानवता के लिए होते हैं, न कि किसी एक समाज या जाति के लिए।

वे कहते हैं कि संस्कृति को पूर्व-पश्चिम, भारतीय-अभारतीय आदि कृत्रिम विभाजनों से घेरकर नहीं रखना चाहिए। संस्कृति का मूल उद्देश्य विश्वजनित सत्य की ओर उन्मुख होना है। जो सत्य पूरी मानवता के लिए सत्य है, वही वास्तविक मूल्य है। विभिन्न संस्कृतियों ने अलग-अलग ऐतिहासिक और भौगोलिक परिस्थितियों में सत्य के अंश पाए हैं, लेकिन संपूर्ण सत्य अभी तक किसी ने नहीं पाया। भारतीय संस्कृति में उन्हें सत्य की ओर अधिक उन्मुखता दिखाई देती है। अभेद की अनुभति कराने वाली संस्कृति ही वास्तविक संस्कृति है। इसलिए हजारीप्रसाद जी कहते हैं कि संस्कृति लोकतांत्रिक ही हो सकती है। उन्होंने आगे कहा कि गांधीजी ने अहिंसा और सत्य की साधना के माध्यम से भेद मिटाने और अभेद की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाया था।

अध्यक्षीय उद्बोधन में रामबहादुर राय ने कहा कि हम लोग सौभाग्यशाली हैं कि हजारी प्रसाद द्विवेदी के सांस्कृतिक चिंतन पर हमने प्रो. नंदकिशोर आचार्य को सुना। आचार्य द्विवेदी के सांस्कृतिक चिंतन को जिस धरातल पर नंदकिशोर आचार्य जी ने हमें समझाया, वह बहुत ऊंचा और दार्शनिक धरातल है। उन्होंने कहा, “आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के दरवाजे सबके लिए खुले रहते थे।” रामबहादुर राय ने आचार्य द्विवेदी के संस्कृति सम्बंधी एक लेख को उद्धृत करते हुए कहा, “उन्होंने उस लेख में हमें यह समझाया है कि भारतीय संस्कृति विकासशील रही है। यह उस लेख का सार है। भारतीय संस्कृति क्यों विकासशील रही है, इसे उन्होंने इस प्रकार समझाया है कि हमारे ऋषि-महर्षियों ने, हमारे चिंतकों ने दरअसल हमारी भारतीय संस्कृति को एक आधार दिया है। प्राचीन विश्वास जीवित रहे, उनकी नई मान्यताओं से संगति बनती चली गई और यही भारतीय संस्कृति के विकासशील होने का लक्षण है। नई मान्यताओं को आत्मसात करने का भी स्वभाव भारतीय संस्कृति में रहा है।”

इससे पूर्व, प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने व्याख्यान की प्रस्तावना प्रस्तुत की और आईजीएनसीए पुस्तकालय और निजी संग्रहों के बारे में बताया, जिसमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की निजी संग्रह भी शामिल है। उन्होंने शोधार्थियों और अन्य आगंतुकों से आईजीएनसीए के पुस्तकालय को देखने का आग्रह भी किया। इस व्याख्यान में विद्वान, शोधार्थी तथा सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोग उपस्थित रहे और आचार्य द्विवेदी के विचारों को नये संदर्भों में समझने का अवसर प्राप्त किया। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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