तेज़-तर्रार और चमकदार कहानियों के दौर में ‘गुस्ताख़ इश्क़’ अपने शांत, गहरे और भावनात्मक अंदाज़ से लोगों को इश्क़ महसूस करवाती है। फ़िल्म वह एहसास लौटाती है, जो धीरे-धीरे पनपता है, दिल में ठहरता है और क्रेडिट्स खत्म होने के बाद भी साथ बना रहता है।
दर्शक इसे “मस्ट वॉच” करार दे रहे हैं और सोशल मीडिया क इसकी तारीफ़ों की बौछार हो रही है। लोग कह रहे हैं कि यह फ़िल्म कला और जीवन से भरी हुई है—बिल्कुल मनीष मल्होत्रा की खासियत की तरह—और गुलज़ार साहब के गीतों ने इसे और भी ख़ास बना दिया है।
फ़िल्म की कहानी, इसके संवाद और पुरानी शैली की शायरी दर्शकों के लिए किसी मुख्य किरदार से कम नहीं लग रही। वहीं फ़िल्म समीक्षक भी इसके पक्ष में उतर आए हैं। अभिनय, भावनात्मक परतें, विजय वर्मा और फ़ातिमा सना शेख़ की केमिस्ट्री और इसके सुकूनदेह संगीत ने क्रिटिक्स को बेहद प्रभावित किया है।
एक फ़िल्म समीक्षक ने तो इसे आज के दौर का “मुग़ल-ए-आज़म” तक लिख दिया। सरल, सच्ची और दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी के साथ ‘गुस्ताख़ इश्क़’ आज के तेज़ रफ्तार समय में एक क्लासिक प्रेम-पत्र सी महसूस होती है—जैसे शोरगुल के बीच कोई मीठी, पुरानी शायरी।
मनीष मल्होत्रा और उनके भाई दिनेश मल्होत्रा द्वारा स्टेज5 प्रोडक्शन के बैनर तले निर्मित तथा विभु पुरी द्वारा निर्देशित ‘गुस्ताख़ इश्क़’ फिलहाल सिनेमाघरों में प्रदर्शनरत है।
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