सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि दिल्ली दंगे [Delhi riots] में सभी आरोपियों की भूमिका समान नहीं है। अदालत के अनुसार, उमर खालिद [Umar Khalid] और शरजील इमाम [Sharjeel Imam] की कथित भूमिका अन्य आरोपियों की तुलना में अधिक गंभीर और उच्च स्तर की बताई गई है, इसलिए उन्हें इस चरण पर जमानत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसि) सामग्री मौजूद है, जिससे उन्हें राहत देना संभव नहीं है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि वे एक साल बाद या संरक्षित गवाहों की सुनवाई पूरी होने के बाद ही दोबारा जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने जिन पाँच आरोपियों को राहत दी है, उनमें गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मुहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं। अदालत ने कहा कि इन आरोपियों की भूमिका तुलनात्मक रूप से कम गंभीर मानी गई है और उन्हें कड़ी शर्तों के साथ जमानत दी जा रही है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत दिए जाने का अर्थ आरोपों से बरी किया जाना नहीं है और मुकदमे की कार्यवाही आगे जारी रहेगी।
गौरतलब है कि फरवरी 2020 में उत्तर–पूर्वी दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। बड़े पैमाने पर संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा था। यह हिंसा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के समर्थन और विरोध के बीच बढ़े तनाव के बाद भड़की थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस की विशेष जांच टीम ने दंगों के पीछे कथित साजिश का दावा करते हुए कई लोगों को गिरफ्तार किया था और यूएपीए जैसी कड़ी धाराओं में मामले दर्ज किए गए थे।
दिल्ली पुलिस का आरोप है कि दंगे पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा थे और कुछ आरोपियों ने भड़काऊ भाषणों व संगठित गतिविधियों के जरिए हिंसा को अंजाम दिया। वहीं, आरोपियों और उनके समर्थकों की ओर से इन आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए खारिज किया जाता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। एक ओर जहां सरकार समर्थक पक्ष इसे न्यायिक सख्ती के रूप में देख रहा है, वहीं मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने लंबे समय से जेल में बंद आरोपियों के मामले को लेकर सवाल उठाए हैं। फिलहाल, अदालत के आदेश के साथ यह साफ हो गया है कि दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में हर आरोपी की भूमिका के आधार पर अलग-अलग न्यायिक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा और अंतिम फैसला मुकदमे के नतीजे पर ही निर्भर करेगा।
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