OPEC, यानी ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज, का गठन 14 सितंबर 1960 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था। उस समय ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला इसके संस्थापक सदस्य बने थे। संगठन का मूल उद्देश्य बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों के दबदबे के बीच उत्पादक देशों के हितों की रक्षा करना, उत्पादन नीतियों में समन्वय स्थापित करना और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर बनाए रखना था। बीते छह दशकों में ओपेक केवल एक आर्थिक मंच नहीं रहा, बल्कि विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला शक्ति केंद्र बन गया। आज भी दुनिया के कुल प्रमाणित तेल भंडार का बड़ा हिस्सा ओपेक देशों के पास है और वैश्विक उत्पादन में उनकी निर्णायक हिस्सेदारी बनी हुई है।यूएई के अलग होने के फैसले को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वह ओपेक के सबसे प्रभावशाली उत्पादकों में शामिल रहा है।
सऊदी अरब से मतभेद सामने आया
पिछले कुछ वर्षों में यूएई ने अपनी उत्पादन क्षमता में बड़ा निवेश किया, लेकिन OPEC के उत्पादन कोटा के कारण वह अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था। माना जा रहा है कि इसी असंतोष ने उसे स्वतंत्र रास्ता चुनने की ओर बढ़ाया। इसके पीछे खाड़ी क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले तेल प्रबंधन मॉडल से रणनीतिक मतभेदों को भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है।
भारत को मिल सकता है सस्ता तेल
भारत के लिए इस फैसले के कई मायने हैं। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और उसकी ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है। भारत के आयात स्रोतों में यूएई, सऊदी अरब, इराक और अन्य खाड़ी देश महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि यूएई ओपेक से बाहर होकर उत्पादन बढ़ाता है और बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति आती है, तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बन सकता है। ऐसी स्थिति में भारत का आयात बिल कम हो सकता है, चालू खाते के घाटे पर सकारात्मक असर पड़ सकता है और पेट्रोल-डीजल से लेकर परिवहन लागत तथा महंगाई पर राहत मिल सकती है।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि यूएई के इस कदम से ओपेक के भीतर असंतोष बढ़ता है और उत्पादन नियंत्रण की सामूहिक व्यवस्था कमजोर पड़ती है, तो वैश्विक बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव तेज हो सकता है। यह अस्थिरता भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय होगी, क्योंकि तेल कीमतों में अचानक तेजी का असर सीधे महंगाई, औद्योगिक लागत और रुपये की विनिमय दर पर पड़ता है।
रणनीतिक स्तर पर यह बदलाव भारत के लिए अवसर भी लेकर आया है। नई दिल्ली के यूएई और सऊदी अरब—दोनों के साथ मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं। बदलते ऊर्जा समीकरणों के बीच भारत दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों, रणनीतिक भंडारण और मुद्रा विनिमय आधारित भुगतान व्यवस्था जैसे विकल्पों पर अधिक सक्रियता से काम कर सकता है। ऊर्जा क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि यह समय भारत के लिए केवल सस्ता तेल खरीदने का नहीं, बल्कि अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा नीति को नए सिरे से परिभाषित करने का है।
स्पष्ट है कि यूएई का ओपेक से अलग होना सिर्फ एक संगठनात्मक फैसला नहीं, बल्कि वैश्विक तेल राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत है। इसके प्रभाव आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार, खाड़ी की कूटनीति और भारत की आर्थिक रणनीति—तीनों में साफ दिखाई दे सकते हैं।
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