श्री राय ने कहा कि गुजरात का नव निर्माण आंदोलन, बिहार छात्र आंदोलन तथा उसके बाद लगाया गया आपातकाल — ये तीन घटनाएँ ऐसी थीं, जिन्होंने विभिन्न विपक्षी दलों को एक साझा मंच पर आने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को निर्णायक मोड़ दिया। उनके अनुसार, इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे सहित अन्य नेताओं की सलाह से संवैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए आपातकाल की घोषणा करवाई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका का उल्लेख करते हुए श्री राय ने कहा कि तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने नानाजी देशमुख, दत्तोपंत ठेंगड़ी तथा अन्य कार्यकर्ताओं को भूमिगत रहकर लोकतांत्रिक प्रतिरोध को संगठित रखने तथा विपक्षी दलों के बीच समन्वय बनाए रखने का दायित्व सौंपा। अपने संबोधन में श्री राय ने एक रोचक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि श्रीमती इंदिरा गांधी इस बात से अत्यंत नाराज़ हुई थीं कि देशभर में संघ के हजारों स्वयंसेवकों के बावजूद प्रारंभिक दौर में केवल लगभग 100 स्वयंसेवकों की ही गिरफ्तारी हो सकी, जबकि बड़ी संख्या में स्वयंसेवक भूमिगत रहकर लोकतांत्रिक आंदोलन को संगठित करने में सक्रिय रहे। श्री राय ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में इस दिन का स्मरण नई पीढ़ी को लोकतंत्र, संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं के महत्व से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि विश्व के अनेक देशों ने अपने संविधान में संशोधन किए हैं, किन्तु संविधान की प्रस्तावना में वैचारिक परिवर्तन आपातकाल के दौरान जिस प्रकार भारत में किया गया, वैसा उदाहरण विश्व में विरल है। उन्होंने इसे तत्कालीन सत्ता की वैचारिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देखा। इस अवसर पर प्रख्यात चिंतक श्री के. एन. गोविंदाचार्य ने भी अपने विचार व्यक्त किए और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के महत्व पर बल दिया।
कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पत्रकार श्री अजय सेतिया द्वारा लिखित पुस्तक ‘इमरजेंसी की अनसुनी कहानियाँ’ का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्वानों, पत्रकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों तथा नागरिकों ने सहभागिता की और लोकतंत्र तथा संविधान की रक्षा के संकल्प को दोहराया।
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