पहले नाटक, फिर टेलीविज़न में क्रूर सिंह के चरित्र से और अंततः हिंदी फिल्मों से प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद अखिलेन्द्रजी ने साहित्य सृजन की ओर ध्यान देना प्रारंभ किया. कोरोना काल में इन्होंने प्रथम कविता संग्रह “अखिलामृतम्” का सृजन किया और फिर लेखन की यात्रा चलती रही. परिणाम है यह पुस्तक ‘अभिनय के सूत्र :अभिनय, अभिनेता और अध्यात्म”.
अपनी रंग यात्रा के क्रम में अखिलेन्द्र पाते थे कि भारतवर्ष में अभिनय को लेकर भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अतिरिक्त कोई अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक उपलब्ध नहीं है. और यह पुस्तक भी एक एक गंभीर सैद्धांतिक पुस्तक है. उन्हें महसूस हुआ कि अब भी रूसी नाट्य विशेषज्ञों के द्वारा अंग्रेजी में अनुदित और लिखित पुस्तक के आधार पर ही भारत के नाट्यकर्मी अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हैं. अखिलेंद्र ने इस कमी को पूरा करने के लिए सोचना शुरू किया.
अखिलेंद्र की अवधारणा है कि एक अभिनेता अभिनय के क्रम में एक आध्यात्मिक यात्रा पर होता है. पात्र के चरित्र के अध्ययन के बाद अभिनेता का एक तरह से परकाया प्रवेश होता है. इस यात्रा और इन अंतर्संबंधों पर चर्चा है. इन अंतर्संबंधों को जानना और समझना नाट्यकर्मियों के लिए आवश्यक है. 156 पृष्ठ के इस हार्डबाउंड पुस्तक के प्रारंभ में लेखक ने समर्पण में लिखा है: “मेरी माई स्व.सीता देवी, मेरे पिताजी स्व.छत्रपति मिश्र के चरणकमलों में और मेरे संहित रंगकर्म करने वाले साथी कलाकारों और निर्देशकों को समर्पित करता हूं.”
लेखक आगे और लिखते हैं: 1.”अभिनेता आध्यात्मिक व्यक्तित्व है। “/2.”अभिनय आध्यात्मिक साधना है।” 3.”अभिनेता प्रत्येक चरित्र के साथ अभिनय करते हुए एक आध्यात्मिक यात्रा करता है, चाहे नाटक हो या सिनेमा।” ये तीनों तत्त्व इस पुस्तक के मूल आधार हैं.’ इन शब्दों में अखिलेन्द्र ‘अध्यात्म ‘ की व्याख्या करते हैं : “मानव शरीर के भीतर ज्ञान प्राप्त करने और व्यवहार करने की जो यांत्रिक व्यवस्था (Machinery System) है , उसका वास्तविक ज्ञान होना ही अध्यात्म है। साधारण शब्दों में कहें तो इसका अर्थ है अपने भीतर काम करने वाली जो कार्य प्रणाली है, उसे जानना ही अध्यात्म है। स्वयं को जानना ही अध्यात्म है।” इस पुस्तक में छोटे छोटे अड़सठ अध्याय हैं. कुछ शीर्षक देखें तो पुस्तक में निहित बातों का अनुमान होगा: अभिनेता (मनुष्य) विचारों का पिंड है/अभिनय के तत्व/सूक्ष्म शरीर का संचालन /सफल अभिनेता की कुंजी/शरीर/प्राण/मन/अंतःकरण चतुष्ठय/वृत्ति/मन/प्रवृत्ति/श्वास/विचार/मनुष्यबके तीन गुण/मनुष्य शरीर में तीन दोष/मन और इंद्रियाँ/ इन्द्रियाभिनय /मनोभाव और परिस्थिति/अभिनय/आंगिक अभिनय/ वाचिक अभिनय/ शब्द-उच्चारण / विराम/सात्विक अभिनय/ आहार्याभिनय/ सामान्य अभिनय/रस/तरंग इत्यादि. लेखक अपने प्रथम अध्याय ‘ संकल्प शक्ति में कहते हैं : “ऐसा संकल्प जिसका कोई विकल्प नहीं ।” लेखक अखिलेंद्र की भाषा परिष्कृत है .इन्होंने प्रचुर तत्सम, तद्भव देशज शब्दों का समुचित प्रयोग किया है पुस्तक में. पुस्तक में बहुत रोचक प्रवाह है और अंतिम पृष्ठ तक उत्सुकता और कौतुक बना रहता है. पुस्तक में भारतीय ज्ञान परंपरा के बहुत सारे तत्वों को लेखक अखिलेंद्र ने समाहित किया है. प्रत्येक अध्याय में थोड़ा और विस्तार उदाहरण के साथ दिया जाता तो आम पाठकों को अधिक सुविधा होती. पुस्तक अति पठनीय और संग्रहणीय है. यह आपके पुस्तक के आलमारी का आकर्षण बढ़ाएगा ! नए अभिनेताओं और रंगकर्मियों के लिए पुस्तक अति उपयोगी होगी.
पुस्तक : अभिनय, अभिनेता और अध्यात्म, लेखक: अखिलेंद्र मिश्र, पृष्ठ: 156(हार्ड बाउंड), प्रकाशक: सर्वभाषा ट्रस्ट, मूल्य:रु.456.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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