गुरु पूर्णिमा पर आयोजित कार्यक्रम के अंतर्गत प्रो. सुधीर लाल, विभागाध्यक्ष- कलाकोश एवं संकायाध्यक्ष, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र द्वारा विभाग का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। इसके उपरान्त श्री संस्कार सुधीर देसाई, अष्टनायिका फिल्म के निर्देशक एवं पटकथा लेखक की उपस्थिति में अष्टनायिका फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया। इस अवसर पर शशिप्रभा कुमार द्वारा संपादित वेदोद्धारक स्वामी दयानन्द, अरिंदम मुखर्जी द्वारा संपादित रिलिजियो कल्चरल सर्वे ऑफ फिफ्टी वन शक्तिपीठाज (खंड 1 एवं 2), गोपाल प्रसाद शर्मा के संपादन एवं कीर्तिकान्त शर्मा के सह संपादन में प्रकाशित शुक्लयजुर्वेदमाध्यन्दिन मालापाठः पूर्वविंशतिः (भाग 1 एवं 2) तथा इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की शोध पत्रिका कलाकल्प के गुरु पूर्णिमा अंक का भी लोकार्पण किया गया।
राम बहादुर राय ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि कलाकोश विभाग प्रत्येक वर्ष गुरु पूर्णिमा को एक नई दृष्टि के साथ मनाने की परंपरा निभाता है। उन्होंने कहा कि ग्रंथों का प्रकाशन, उनका लोकार्पण तथा विभाग की वार्षिक गतिविधियों का प्रस्तुतीकरण इस आयोजन को एक प्रकार का “राष्ट्रीय उपनिषद” बना देता है। उन्होंने कलाकोश विभाग की आस्था, निष्ठा और साधनामय कार्यसंस्कृति की सराहना करते हुए कहा कि आईजीएनसीए का प्रत्येक विभाग अपने आप में किसी बड़े विश्वविद्यालय से कम नहीं है और यहाँ हो रहे कार्यों की जानकारी अधिकाधिक लोगों तक पहुँचनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा हमें गुरु के वास्तविक स्वरूप का बोध कराती है। जिस प्रकार चंद्रमा सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित करता है, उसी प्रकार गुरु ज्ञान के प्रकाश को शिष्य के जीवन में प्रतिबिंबित कर उसे सही दिशा प्रदान करता है। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्वयं से एक ईमानदार प्रश्न करें और अंतर्मन से प्राप्त उत्तर को ही अपना मार्गदर्शक बनाकर जीवन में आगे बढ़ें।
डॉ. सरिता पाठक ‘यजुर्वेदी’ ने अपने सभी गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि कला के क्षेत्र में गुरु शिष्य परंपरा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कला केवल तकनीक से नहीं, बल्कि गुरु के सान्निध्य, मार्गदर्शन और निरंतर साधना से प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि गुरु और शिष्य दोनों एक दूसरे की खोज करते हैं तथा भारतीय संस्कृति में गुरु एक व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि एक दिव्य तत्व हैं। वैदिक काल से ही गुरु शिष्य परंपरा भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारशिला रही है। उन्होंने कहा कि गुरुकुल परंपरा में गुरु शिष्य की क्षमता के अनुरूप उसका निर्माण करता है और ज्ञान, संस्कार तथा कला का वास्तविक अर्जन गुरु के सान्निध्य और दीर्घकालीन साधना से ही संभव है।
आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने गुरु पूर्णिमा एवं कला कोश विभाग के प्रतिष्ठा दिवस पर विभाग की एक वर्ष की उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन पाठ), 51 शक्तिपीठों के प्रामाणिक डॉक्यूमेंटेशन, कलाकल्प शोध पत्रिका की नियमितता एवं प्रतिष्ठा तथा संस्कार देसाई द्वारा निर्मित शोधपरक फिल्म को विभाग की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताया। उन्होंने कहा कि आज के समय में गुरु की महत्ता पहले से अधिक बढ़ गई है। ज्ञान अनेक माध्यमों से प्राप्त हो सकता है, किंतु उसके सही उपयोग, समय और दिशा का बोध केवल गुरु ही करा सकता है। इसलिए जीवन में ज्ञान और साधना की सिद्धि के लिए गुरु का स्मरण, सम्मान और आशीर्वाद अनिवार्य है।
प्रो. ओमनाथ बिमली ने कहा कि भारतीय संस्कृति मूलतः ज्ञान संस्कृति है, जिसमें गुरु को ज्ञान के संप्रेषण और जीवन दृष्टि के निर्माण का सर्वोच्च माध्यम माना गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मूल आधार गुरु शिष्य परंपरा और ज्ञान के प्रति श्रद्धा है। गुरु शिष्य को केवल सूचना नहीं, बल्कि सत्य के साक्षात्कार तक पहुँचाकर आत्मबोध और जीवन के उच्चतम लक्ष्य की ओर अग्रसर करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल सांसारिक ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का विकास और परम सत्य की अनुभूति है।
फिल्मकार संस्कार सुधीर देसाई ने कहा कि ‘अष्ट नायिका’ विषय पर आधारित यह फिल्म 35 वर्षों के अध्ययन का परिणाम है। उन्होंने बताया कि इसका उद्देश्य नाट्यशास्त्र की इस अवधारणा को सरल रूप में जनसामान्य तक पहुँचाना है तथा दर्शकों से फिल्म पर अपने विचार साझा करने का आग्रह किया।
आरम्भ में डॉ. मयंक शेखर ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. योगेश शर्मा द्वारा किया गया, जबकि अंत में डॉ. अरविन्द शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
समारोह के दौरान भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और कला के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति कलाकोश विभाग की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों एवं श्रोताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा और गुरु की महत्ता पर व्यक्त विचारों का स्वागत किया।
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