इनकी ग़ज़लें जिंदगी के बहुत करीब होती हैं. डॉ. भावना को पूरे देश की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित और पुरस्कृत किया है। डॉ भावना ने इस ग़ज़ल संग्रह को अपनी माँ को समर्पित किया है. भावना लिखती हैं ‘महिला सशक्तिकरण की पर्याय स्नेहमयी माँ डॉ. शांति कुमारी को ‘. भावना अपनी सारी रचनाओं में अपनी माँ को श्रद्धापूर्वक याद करती हैं. प्रसिद्ध ग़ज़लकार दिनेश प्रभात ने पुस्तक के कवर पृष्ठ के पीछे सुन्दर टिप्पणी की है. डॉ. भावना की अब तक एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । अपने पहले ग़ज़ल संग्रह “अक्स कोई तुम सा ” के साथ ही इन्होंने हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी.
उसके बाद “शब्दों की कीमत “, “चुप्पियों के बीच “,”मेरी माँ में बसी है “,”धुन्ध में धूप ” और अब ये पांचवा ग़ज़ल संग्रह ” चिड़ियों की दावेदारी “! 96 पृष्ठ के इस संग्रह में कुल 79 ग़ज़लें शामिल हैंं. ग़ज़लों में जिंदगी के लगभग सभी पहलुओं की झलक मिल जाएगी. इस संग्रह को पढ़ते हुए कभी फैज, कभी रूमी और कभी निदा फाजली याद आ जाते हैं. दुष्यंत की उपस्थिति तो हर हिन्दी ग़ज़ल में रहती ही है साए की तरह, इसमें भी है. संग्रह “चिड़ियों की दावेदारी” के ग़ज़लों के कुछ शीर्षक देखें: सियासी गर्भ में कुछ पल रहा है, उसकी आंखों में समुंदर देखकर, यहाँ महलों की तूती बोलती है, क्य़ा कहूँ कितना कहूँ मर्ज़ी है बिल्कुल आपकी, जिसे देखो वही पत्थर हुआ है, तेरे चेहरे पे जो बेबसी है इत्यादि. संग्रह में ग़ज़लों की भाषा सरल है, बोधगम्य है और प्रांजल है. तत्सम और तदभव शब्दों का उचित और समीचीन प्रयोग किया गया है. भावना की ग़ज़लों में इश्क भी है , रूह भी है, दर्द भी है, पसीना भी है ,आंसू भी है और आँचल भी है. संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है. मुखपृष्ठ आकर्षक है, छपाई सुन्दर है.
संग्रह: चिड़ियों की दावेदारी (हार्ड बाउंड), कवयित्री: डॉ. भावना, प्रकाशक: shwetverna . पृष्ठ: 96, मूल्य: रू. 299.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
ये भी पढ़ें :-पठनीय है रेणु झा ‘रेणुका’ का कहानी संग्रह “गाँव से गुजरते हुए”